कथन


व्यास को राजनीति में मत खींचिए। इन्हें पत्रकारिता और हिन्दी-सेवा का कार्य करने दीजिए। राष्ट्रसेवा के लिए इन दोनों की बहुत आवश्यकता है। मैं इनके दोनों कार्यों से प्रसन्न हूं।

---- महात्मा गांधी ----

श्री व्यासजी अपनी साहित्यिक सेवाओं के लिए सदैव स्मरणीय रहेंगे। आणविक युग में राजनीतिक और पांथिक धर्मों को विदा होना है और उनकी जगह विज्ञान और आत्मज्ञान को लेनी है। विज्ञान और आत्मज्ञान को जोड़ने वाली शक्ति व्यासजी जैसे साहित्यिकों और शिक्षकों की होगी।

---- विनोबा भावे ----

व्यास, हिन्दी-हिन्दी चिल्लाने से हिन्दी नहीं चलेगी। उसके लिए प्रेमपूर्वक लगातार ठोस कार्य करने होंगे। तुम केन्द्रीय हिन्दी सलाहकार समिति का काम संभाल लो और जुट जाओ हिन्दी की सेवा में। लालबहादुर भी यही चाहते हैं।

---- जवाहरलाल नेहरू ----

मेरे मित्र व्यासजी की हिन्दी-सेवा स्तुत्य है।

------ राजर्षि टंडन ----

मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि श्री गोपालप्रसाद व्यास में हास्य-व्यंग्य साहित्य के सृजन के सभी गुण विद्यमान हैं। विनोदी स्वभाव होने के कारण इन्हें शब्दों की अधिक ढूंढ़-खोज की आवश्यकता नहीं पड़ती। इनकी रचना गुदगुदाती ही नहीं, झकझोरती भी है। मन हंसने लगता है और बुद्धि विचारने। इनके विनोदी स्वभाव ने इनकी पत्रकारिता में भी एक विशेषता ला दी है। पत्रकारिता एक गंभीर और चिंतन-साध्य कार्य है। किन्तु इनके 'यत्र-तत्र-सर्वत्र' और 'नारदजी खबर लाए हैं'' स्तंभों में व्यंग्य-विनोद और गाम्भीर्य तीनों के दर्श न होते रहते हैं।

---- जगजीवन राम ----



यह निश्चय है कि श्री गोपालप्रसाद व्यास बहुत सुन्दर लिखते हैं। प्रसन्नता की बात यह है कि हिन्दी में आपके समान हास्य-रस के लेखक एक अंगुली पर गिनने की संख्या में समुचित वृद्धि करने में समर्थ हुए हैं।

---- मैथिलीशरण गुप्त ---


दिल्ली के सांस्कृतिक जीवन में श्री गोपालप्रसाद व्यास का स्थान अत्यंत स्पृहणीय है। सच पूछिए तो दिल्ली में व्यासजी हिन्दी के सबसे जागरूक सेवक और प्रहरी हैं। जब टंडनजी जीवित थे, वह हर बार सभाएं आयोजित करने की जिम्मेवारी व्यासजी पर डालते थे और जब राजर्षि बीमार होकर दिल्ली से प्रयाग चले गए, तब भी हिन्दी-आंदोलन के सभी मुख्य सूत्र व्यासजी के ही हाथों में रहते थे।

---- रामधारी सिंह 'दिनकर' -----


व्यासजी का हास्य निःसंदेह परिमार्जित तथा सुरुचिपूर्ण है। जीवन-संघर्ष तथा युग की समस्याओं की झांकियां होने पर भी उनमें कटुता नहीं।


----- सुमित्रानंदन पंत ----



हमारे व्यासजी तो आनंदमूर्ति हैं। आनंद ही जीवन और साहित्य का परम लक्ष्य है।

---- महादेवी वर्मा ----




व्यासजी की संगठन-शक्ति, व्यावहारिकता, चातुर्य, विनोदी स्वभाव और दूरदर्शिता तथा कार्य-तत्परता से हिन्दी का बहुत हित-साधन हुआ है।
---- सेठ गोविन्ददास ----




व्यासजी ने लाखों व्यक्तियों का मनोरंजन किया है और उनकी विनोदपूर्ण रचनाओं के सहस्त्रों ही प्रशंसक हैं। जिस-जिस पत्र में वह लिखते हैं, उसकी लोकप्रियता बढ़ जाती है।
---- बनारसीदास चतुर्वेदी----



व्यासजी का साहित्य अपने विनोद-आवरण में एक गहरी जीवन-दृष्टि का परिचय देता रहा है। अपने क्षेत्र में वह बिना किसी प्रतिद्वन्द्वी के आज तक सुस्थित हैं। वह हिन्दी के मर्मज्ञ साहित्यकार और ब्रज-क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं।

---- माखनलाल चतुर्वेदी ----



पंडित गोपालप्रसाद व्यास सच्चे मित्र और फक्कड़ स्वभाव के पुरुष हैं। उनमें जीवट है, लगन है, निर्माण शक्ति और सरलता है। उनके स्वभाव में विनोद की अभिव्यक्ति करने का सामर्थ्य है। अनेक बार उनकी हास्य-व्यंग्यपूर्ण कविताएं मैंने सुनी हैं। काव्य में हास्य-रस को उन्होंने सफलतापूर्वक उतारा है। उनका गद्य-साहित्य भी हिन्दी-साहित्य में पूर्ण रूपेण प्रकट हुआ है।

---- बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'----




यह तो घर है 'हास्य' का,
खाला का घर नाहिं।

---- डॉ0 रामकुमार वर्मा ----



श्री गोपालप्रसाद व्यास से मेरा परिचय काफी पुराना है। आरंभ से मैं उन्हें हास्य-विनोद के अच्छे लेखक के रूप में देखता आया था। उन्होंने दिल्ली में हिन्दी लेखकों के संगठन और हिन्दी भाषा के उन्नयन के लिए जो गंभीर कार्य किया है, उससे उनके कुशल संगठनकर्ता और सहृदय साहित्यकार होने की पुष्टि होती है।

--- नंददुलारे वाजपेयी -----


श्री व्यासजी की कविताओं की विशेषता है कि उन्होंने दूसरों के सिर पर होली नहीं खेली है। समाज की गहरी चुटकियां ली हैं, उसे चिकोटियां काटी हैं, किन्तु सभी अपने का निशाना बनाकर। इस प्रकार का साहित्य हिन्दी में लगभग है ही नहीं।

---- भदन्त आंनद कौसल्यायन -----


मैं उनके चरित्र की कतिपय ऐसी विशेषताओं को मानता हूं , जिन्हें उनके विरोधियों को भी स्वीकार करना पड़ता है। ये विशेषताएं हैं- व्यवहार-बुद्धि, संगठन-शक्ति और अध्यवसाय।
---- डॉ0 नगेन्द्र ----



व्यासजी अपनी सचेतावस्था से ही राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा में संलग्न हैं। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं से अपने इस कार्य को संपन्न किया है। शुद्ध साहित्यिक कारोबारी न होकर व्यासजी राष्ट्रीय भावना के भी मूर्तिमंत प्रतीक हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए भी उन्होंने बहुत समय दिया है। हिन्दी-पत्रकारिता में उनकी अपनी देन है, जिसे भूलना कभी संभव नहीं होगा। ऐसे कार्यशील व्यक्ति के प्रति अपना आभार प्रकट करना हम सब का कर्त्तव्य है। उनके अभिनंदन में मेरी आस्था भी सम्मिलित मानें!

---- वाचस्पति पाठक ----


व्यासजी में लोगों को एकत्र करने का जादू है।

---- बेढब बनारसी ----



राजनीतिज्ञों के साथ रहने के बावजूद व्यासजी में कुछ अजीब-सा अल्हड़पन है, जो मुझे हमेशा आकर्षित करता है। व्यंग्य-विनोद उनके स्वभाव का अंग है।
----उपेन्द्रनाथ 'अश्क'----



हास्य की स्थापना हिन्दी में मैंने की थी। आज हास्य का यह विशाल मन्दिर देखकर मैं फूला नहीं समाता। मुझे तो संतोष तब होगा जब यह मंदिर इतना विशाल हो जाए कि विश्व-साहित्य भी इसके आगे सिर झुका दे। इसलिए मैं अपना मुकुट उतारकर व्यासजी के सिर पर रखता हूं।

---- जी.पी.श्रीवास्तव ----



व्यासजी का नाम हिन्दी में हास्य-रस का पर्यायवाची-सा बन गया है।

---- डॉ0 प्रभाकर माचवे ----



गोपालप्रसाद व्यास भाषा के धनी हैं। ब्रजभाषा और खड़ी बोली की शैलियों में वह समान रूप से धाराप्रवाह लिख पाते हैं। यह एक संयोग है कि उन्होंने व्यंग्य और विनोद के साहित्य का ही अधिक सृजन किया है। हिन्दी में व्यंग्य और विनोद का साहित्य कम है, इसलिए उन्होंने उसी क्षेत्र को संपन्न किया, यह एक तरह से अच्छा ही है। किन्तु उनकी अन्य रचनाओं को देखकर मुझे कई बार लगा है कि व्यासजी ने हिन्दी साहित्य के साथ, और अपने साथ भी, दूसरी दिशाओं की अपेक्षाकृत अवहेलना करके उचित नहीं किया है। व्यासजी की कलम में ज़ोर है।

---- भवानीप्रसाद मिश्र ----


नमस्तेस्तु व्यासाय, हास रूपाय ते नमः
नमो नारद बापाय, वेदव्यासाय ते नमः


---- कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर -----




पढ़कर 'हिन्दुस्तान' में 'यत्र-तत्र-सर्वत्र',
श्रद्धा उमड़ी, लिख दिया हृदय खोलकर पत्र।
हृदय खोलकर पत्र, निष्कपट उत्तर पाया,
ले कर पहुंचे रोरी-चावल और कलाया।
याद रहेगी जीवन भर वह स्वर्णिम बेला,
गुरू बने श्री 'व्यास' होगए 'काका' चेला।
जादू-सा कुछ होगया, बदला अपना रंग,
हास्य-व्यंग्य में नित नई उठने लगीं तरंग।
उठने लगी तरंग, भाग्य ने पल्टा खाया,
चमत्कार दिखलाने लगी गुरू की माया।
'काका' व्यंग्य-बाण जब सम्मेलन में छूटे,
बल्ली हिलने लगे मंच के तख्ते टूटे।

---- काका हाथरसी ----




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