गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( डॉ० बालशौरि रेड्डी )

प्रश्न :
सूचना प्रोद्यौगिकी के भूमंडलीकरण तथा कम्प्यूटरीकरण के युग में उसके अनुरूप हिन्दी को ढालने में कौन-से उपाय कारगर सिद्ध हो सकते हैं ?
उत्तर :
मुझे यह कहने में कोई दुविधा नहीं है कि आधुनिक विज्ञान, सूचना और प्रोद्यौगिकी, भूमंडलीकरण और कम्प्यूटरीकरण के युग में मुझे पत्रकार होने के नाते सूचना-भर है। परंतु प्रारंभ से ही मैं विज्ञान और गणित में सदा फेल होता रहा हूं तथा प्रोन्नति प्राप्त करके उत्तीर्ण होता रहा हूं। मुझसे साहित्य के विषय में पूछिए। कलाओं के विषय में पूछिए। संगीत के विषय में जानिए। पुरातत्व और भारत-विद्या के बारे में मेरी थोड़ी गति है। आधुनिक तकनीक और विज्ञान में मेरी कोई पैठ नहीं है। क्षमा करें, मुझे जिन विषयों की पर्याप्त जानकारी नहीं है, उनका मिथ्या-ज्ञान बघारकर मैं लोगों को भ्रमित करने की धृष्टता नहीं कर सकता। परंतु मैं इतना तो कह सकता हूं कि जब तक कोई भाषा अपने युग की तकनीक से नहीं जुड़ेगी, तब तक उसके विकास की संभावनाएं क्षीण ही बनी रहेंगी।

प्रश्न :
आप लेखन की ओर कैसे प्रवृत्त हुए ? उन प्रेरणा के स्त्रोतों पर प्रकाश डालिए। प्रत्येक रचनाकार आरंभ में कविता की ओर प्रवृत्त होता है फिर अपनी रुचि की विधा का चयन करता है। आप किन-किन विधाओं में अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करने में अधिक सफलता की संतुष्टि अनुभव करते हैं ?
उत्तर :
लेखन से मैं कैसे जुड़ा-इस सुखद प्रश्न का उत्तर मैं अवश्य देने की चेष्टा करूंगा। मैं प्रारंभ से ही कविता, जो उस समय ब्रजभाषा में की जाती थी, से जुड़ा रहा हूं। मेरी कक्षा के शिक्षक प्रो० सत्येन्द्र जो भाषा, साहित्य और आलोचना के माने हुए विद्वान थे तथा मुझ पर बड़े कृपालु थे। उनकी कृपा से मैं लेखन, समालोचना और पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे बढ़ने की ओर अग्रसर हुआ। तदनंतर हिन्दी-जगत के जाने-माने आलोचक, व्यंग्य-विनोदकार बाबू गुलाबराय के साहचर्य और निर्देशन से मैं लेखन व संपादन के क्षेत्र में कदम बढ़ा सका।
फिर तो देवदास गांधी, बनारसीदास चतुर्वेदी और धर्मवीर भारती ने कह-कहकर, लिख-लिखकर मेरा हौसला बढ़ाया और मेरी रचनाएं उनके पत्रों में ही नहीं, सभी पत्रों में प्रकाशित होने लगीं। यहां तक की लिखते-लिखते मैंने पचासों पुस्तकों की रचना कर डाली। जहां तक मेरी संतुष्टि का प्रश्न है तो मुझे परम संतोष व्यंग्य-विनोद लिखने से ही प्राप्त होता है। इस विधा में मैंने कविताएं भी लिखी हैं। इसी के द्वारा मुझे साहित्य में यत्किंचित मान-सम्मान मिला है।

प्रश्न :
नवरसों में हास्य का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है। जीवन को आह्‌लादमय बनाए रखने में हास्य की भूमिका प्रशंसनीय रही है। आपकी दृष्टि में सारस्वत के सृजन में हास्य की कैसी भूमिका या प्रयोजन है ?
उत्तर :
मेरी मान्यता यह है कि हास्य जीवन की सुखद अनुभूति है, ज़िदगी है, ज़िदादिली है, तन-मन का स्वास्थ्य है। आज के त्रस्त और दुःखी जीवन के लिए संजीवनी बूटी है। मैंने जगह-जगह कहा भी है कि, "हास्य सोने की अंगूठी, व्यंग्य सांवरौ नगीना है।'' हास्य को तो प्राचीन साहित्यशास्त्रियों ने नवरसों में महत्वपूर्ण स्थान दिया है, लेकिन व्यंग्य तो आजकल जनजीवन में मान्यता प्राप्त कर गया है। साहित्यशास्त्री उसे लक्षणा, व्यंजना, वक्रोक्ति आदि में ही रखकर संतुष्ट हो जाते हैं। वे उसकी महत्ता को अभी तक परख नहीं पाए हैं। मेरे विचार से हास्य बिना व्यंग्य के सूना है और व्यंग्य बिना हास्य के अर्थहीन है। इन दोनों का समन्वय साहित्य के विकास के लिए बहुत आवश्यक है। इससे दोनों विधाएं साहित्य और समाज में समादृत हो सकती हैं।

प्रश्न :
हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य के मध्य किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है ? सही मायने में हिन्दी को भारत-भारती के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कौन-सा कदम उठाना चाहिए ?
उत्तर :
हिन्दी और भारतीय भाषाओं के सामंजस्य से ही भारतीय भाषाओं में सौमनस्य पैदा हो सकता है, देश की सांस्कृतिक एकता सुदृढ़ हो सकती है। इसके लिए यह आवश्यक है कि अनुवाद की क्षमता का विकास किया जाए। प्रादेशिक साहित्य हिन्दी में अनूदित हो और हिन्दी-साहित्य प्रादेशिक भाषाओं में अनूदित हो तो भारतीय साहित्यिक संपदा विश्व में समादृत हो सकती है। इसके संबंध में हमारी प्रादेशिक भाषाएं तो हिन्दी-साहित्य को अपनी-अपनी भाषाओं में परोस रही हैं, लेकिन हिन्दी में प्रादेशिक साहित्य को लाने के प्रयास नहीं हो रहे, जो होने चाहिए। इसके लिए अहिन्दीभाषी स्तुत्य हैं, वंदनीय हैं। वे मेरा नमन स्वीकार करें। जय हिन्दी ! जय हिन्द !!

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