गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( डॉ० बालशौरि रेड्डी )

प्रश्न : आप राष्ट्रीय आंदोलन एवं राष्ट्रभाषा के आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं और इनके साक्षी भी रहे। उस कालखंड में लोगों के मन में देश, भाषा एवं संस्कृति के प्रति जो निष्ठा और समर्पित भावना थी, वह मृगमरीचिका मात्र रह गई है। इस बदलाव का क्या कारण हो सकता है ?
उत्तर : यह मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं राष्ट्रीय आंदोलन व राष्ट्रभाषा-आंदोलन से प्रारंभ से जुड़ा रहा हूं। प्रारंभ में देश और राष्ट्रनिष्ठा के प्रति जो भावना थी, वह आज देखने में नहीं आती। मैं इस बदलाव का कारण अंग्रेजी और अंग्रेजियत को मानता हूं। अंग्रेज शासकों ने हमारे धन-वैभव और उद्योगों को ही नष्ट नहीं किया, लार्ड मैकाले की नीति ने हमारी शिक्षा को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। अब समय आगया है हम चेत जाएं और क्लर्क एवं बाबू बनाने वाली शिक्षा-नीति को रोजगारोन्मुख, स्वदेश और स्वभाषा की दृष्टि से बदल डालें। यदि अभी नहीं तो कभी नहीं होगा, आज़ादी लाने वालों का सपना, सपना ही बनकर रह जाएगा और देश पतन के गर्त में गिरता ही चला जाएगा।

प्रश्न : आप महात्मा गांधीजी के अनुयायी रहे और उनके जीवन-दर्शन के पक्षपाती भी। साथ ही उसके प्रभाव में आकर आपने कतिपय रचनात्मक कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में योगदान दिया। गांधी-दर्शन की प्रासंगिकता के बारे में आप क्या सोचते हैं ?
उत्तर : आज एक ऐसा वर्ग पैदा होगया है जो गांधी-दर्शन को, उनके रचनात्मक कार्यक्रमों को वर्तमान युग में प्रासंगिक नहीं मानता और कहता है कि नए युग में गांधी प्रासंगिक नहीं रहे। मैं ऐसा नहीं मानता। गांधी-दर्शन केवल उनके युग तक सीमित नहीं था। उनके सिद्धांत शाश्वत हैं। आज भी विश्व शांति की खोज में भटक रहा है और हिंसा को लेकर परेशान है। तो केवल गांधी-दर्शन ही है जिससे उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त होता है कि सत्य ही ईश्वर है। सर्व-धर्म-समभाव ही शाश्वत है। उनका स्वदेश-प्रेम ध्यान से देखा जाए तो विश्वप्रेम ही है। उनके उपदेश हज़रत मुहम्मद और ईसा मसीह की तरह सबके लिए हैं। उन पर चलकर सत्यरूपी सत्यस्वरूप ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। गांधी-दर्शन अध्यात्म-दर्शन है। ऐसा दर्शन जो सबको प्रिय और सबका हितकारी है।

प्रश्न : राष्ट्रभाषा हिन्दी को राजभाषा के रूप में संविधान में और बाहर से भी स्थान दिलाने में हिन्दीतर भाषी प्रचारकों तथा नेताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस संबंध में आपका क्या विचार है ?
उत्तर : यह कहना समीचीन नहीं है कि हिन्दी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा बनाने में हिन्दीतर भाषा-भाषियों का कोई योगदान नहीं है। इसके विपरीत सच्चाई यह है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा और संविधान में राजभाषा बनाने में अहिन्दीभाषियों का महत्वपूर्ण योगदान है। मुझे उस समय की याद आ रही है जब संविधान बनाया जा रहा था तो राजर्षि टंडन ने राजधानी में एक 'राजभाषा व्यवस्था परिषद' बनाई थी, जिसका एक मंत्री मैं भी था। उस परिषद में हिन्दीतर भाषा-भाषी विद्वान, न्यायविद्, संविधान-विशेषज्ञ उपस्थित हुए थे। सभी ने सर्वसम्मति से हिन्दी को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव संविधान-निर्मात्री सभा को भेजा था। यह प्रस्ताव जब संसद में विचारार्थ आया तो केवल एक मत विरोध में पड़ा जो नेहरूजी का था, जो हिन्दी प्रदेश का नेतृत्व करते थे, लेकिन अंग्रेजी के हिमायती थे। मुझे कहने दीजिए कि यदि गुजराती-भाषी गांधीजी और बंगलाभाषी सुभाषचंद्र बोस व रवीन्द्रनाथ ठाकुर एवं मराठीभाषी तिलक ने राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपना समर्थन न दिया होता तो हिन्दी आज जहां है वहां भी नहीं होती। आज तो हिन्दी न राजभाषा है, न राष्ट्रभाषा। अब तो यह जोड़भाषा बन गई है। इस जोड़भाषा को मैं तोड़भाषा मानता हूं। इसी ने अंग्रेजी को रानी और हिन्दी को नौकरानी बना दिया। बाबू जगजीवनराम कहा करते थे कि "पहले अंग्रेजी तो जाए। अंग्रेजी गई तो हिन्दी आई समझिए।'' परंतु उनको क्या कहा जाए जो अंग्रेजी को नवयुग के नए ज्ञान-विज्ञान की भाषा मानते हैं कि अंग्रेजी के बिना हम अज्ञानी और अविज्ञानी बनकर रह जाएंगे। यह कितना बड़ा भ्रम है ! फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन और जापान जैसे देशों में जहां अंग्रेजी कोई नहीं जानता, उन्होंने जैसी सर्वांगीण उन्नति स्वभाषा में की वह जगज़ाहिर है। भारत अपनी स्वभाषाओं के द्वारा ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति क्यों नहीं कर सकता ? एक दिन अवश्य आएगा कि जब वह स्वभाषा के द्वारा सर्वांगीण उन्नति करके रहेगा।

प्रश्न : विश्व में चीनी भाषा के पश्चात्‌ हिन्दी बोलने वालों की संख्या अधिक है। चीन ने अपने राष्ट्र के भीतर अपनी भाषा को अस्मिता की भाषा और अपनी धरती की भाषा के रूप में दर्ज़ कराया और वहां के नेता जहां भी जाते हैं अपने देश की भाषा में बोलते हैं और इसमें अपने लिए गौरव और गर्व की अनुभूति का अनुभव करते हैं। ऐसी भाषाओं में अरबी, फ्रेंच जैसी भाषाएं वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्रसंघ में व्यवहार की भाषा बनी हैं और हम लोग 'विश्व हिन्दी सम्मेलनों' में प्रस्ताव-मात्र पारित करते जाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में तत्काल हमें कौन-सा कदम उठाना चाहिए जिससे हिन्दी विश्व की भाषाओं की पंक्ति में मान्यता प्राप्त कर सके ?
उत्तर : आपका प्रश्न उचित है कि विश्व की तीसरी बड़ी भाषा होने पर भी हिन्दी अभी तक संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा क्यों नहीं बन सकी ? इस संबंध में दोष सरकार का उतना नहीं, जितना कि हमारे अंग्रेजीपरस्त अंग्रेजीदां साहब लोगों का है कि उन्हें क्या देश में, क्या विदेश में हिन्दी बोलने में शर्म आती है और वे उन देशों में भी जहां के लोग अंग्रेजी नहीं जानते, वहां भी अंग्रेजी में बोलते हैं। जहां तक वर्तमान सरकार का प्रश्न है, आजकल वह 'विश्व हिन्दी सम्मेलन' में ही नहीं, भारत के प्रधानमंत्री जिन-जिन देशों में जाते हैं, वहां की सरकारों और जनसभाओं को प्रेरित करते रहते हैं कि वे संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी के पक्ष का समर्थन करें और आशा की जानी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी को उसकी जनसंख्या के आधार पर ही नहीं, उसकी सहज 'सुबोध' सहजगम्यता के कारण हिन्दी अपने को प्रतिष्ठित कर सकेगी। परंतु इस संबंध में मुझे गांधीजी का कथन स्मरण आ रहा है। बापू कहा करते थे कि "जब कोई लड़का अपनी मां को अंग्रेजी में पत्र लिखता है या कोई लड़की अंग्रेजी फटाफट बोलकर पति के मित्रों के सामने यह सिद्ध कर सके कि वह सभ्य है, पढ़ी-लिखी है तथा जब हमारे शिष्टमंडल और विदेशों में हमारे राजदूत अंग्रेजी बोलकर यह जताने की कोशिश करते हैं कि भारत की भाषा अंग्रेजी है, तब मैं सोचता हूं कि भारत की संस्कृति किधर जा रही है ?'' आवश्यकता इस बात की है कि हम राजदूतों और विदेशों में जाने वाले शिष्टमंडलों को पासपोर्ट इस शर्त के साथ जारी करें कि वे हिन्दी का प्रयोग करेंगे, तभी भारतीय संस्कृति और उदात्त जनभावनाओं को विश्व में प्रचारित कर सकेंगे। यह तभी संभव है जब हम प्रारंभ से ही अपने लड़के-लड़कियों को हिन्दी में शिक्षित और दीक्षित कर सकेंगे। परंतु हो रहा है आजकल इसके विपरीत। हम अपने बच्चों को कॉन्वेन्ट या पब्लिक स्कूलों में अंग्रेजीपरस्त बनाने के लिए अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करके लगे हुए हैं। आजकल हमारे देश में साक्षरता का प्रचार बढ़ रहा है। यदि लोगों को पहले प्रारंभ से ही हिन्दी में साक्षर बनाया जाए तो हम अंग्रेजी के कुचक्र से बच सकते हैं, अन्यथा अंग्रेजी चल रही है और चलती रहेगी। क्या हमारी सरकार या जनता मेरे इस आग्रह की ओर ध्यान देने का कष्ट करेगी ? उन्हें करना चाहिए, इसी से देश की भाषा, साहित्य, संस्कृति और कलाओं का निखिल विश्व में प्रचलन हो सकेगा, जिससे दुनिया के लोग परिचित होना चाह रहे हैं। हालत यह है कि विश्व के देशों में तो हिन्दी का प्रचलन बढ़ रहा है। लोग हिन्दी पढ़ रहे हैं, बोल रहे हैं। पत्र-पत्रिकाएं हिन्दी में निकल रही हैं। यहां तक कि लोग हिन्दी में कविता, कहानी, उपन्यास लिखकर हिन्दी का सम्मान बढ़ा रहे हैं। परंतु हमारे देश में हिन्दी की पुस्तकों से अधिक अंग्रेजी पुस्तकों की खरीद बढ़ रही है और हम हिन्दी के बजाय अंग्रेजी में ही रचनाएं लिखकर स्वभाषा की लज्जाजनक उपेक्षा कर रहे हैं। यह अत्यंत शोचनीय है। इसके लिए समाज को बदलने का प्रयत्न करना चाहिए।

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