गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( डॉ० बालशौरि रेड्डी )

       
यदि अभी नहीं तो कभी नहीं

       

प्रश्न : आप भारत की अस्मिता की भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रबल पक्षधर ही नहीं, बल्कि 6-7 दशकों से हिन्दी के प्रचार, विकास, उन्नयन एवं कार्यान्वयन के पुरोधा भी रहे हैं, साथ ही आपने हिन्दी के प्राण महर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन जैसे भाषा-प्रेमी एवं राष्ट्रभाषा के साथ हिन्दी की श्रीवृद्धि में सक्रिय सहभागिता की और हिन्दी को प्रजातंत्र की प्रशासनिक भाषा बनाने का गांधीजी का जो सपना था, उसे साकार करने की दिशा में आपकी पीढ़ी ने जो कार्य किया, उसमें आपको कहां तक सफलता मिली ?
उत्तर : मेरा सौभाग्य है कि भारत की भाषा हिन्दी के संबंध में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का आशीर्वाद मिला और राजर्षि टंडनजी ने मेरा हाथ पकड़कर हिन्दी-पथ पर मुझे अग्रसर किया। मैंने विशेष तो नहीं, लेकिन जो कुछ हिन्दी का कार्य किया वह मेरे व्यंग्य-विनोद के लेखन से जो लोकप्रियता मिली थी, उसके बलबूते पर जनता के प्रेम और समर्थन से मैं हिन्दी भाषा और अपने समय में जो जनता अंग्रेजीपरस्त एवं उर्दूमय थी, उसे हिन्दीमय बनाने की भरसक चेष्टा करता रहा। स्व० टंडनजी ने कहा था कि "दिल्ली में हिन्दी चलेगी तो वह सारे देश में प्रचलित हो जाएगी। दिल्ली राजधानी और राजनीति का केन्द्र ही नहीं, भाषा, साहित्य, संस्कृति व कला का भी केन्द्र रही है। व्यास, तुम दिल्ली को हिन्दी का केन्द्र बनाकर हिन्दी का काम करो'' तो मैंने टंडनजी के आदेश पर जनता में उर्दू और प्रशासनिक क्षेत्र में अंग्रेजी का जो गढ़ थी, केन्द्रस्थ हिन्दी साहित्य सम्मेलन नामक संस्था की स्थापना करके दिल्ली में हिन्दी के काम का शुभारंभ किया। हिन्दी-हितैषी अपने कुछ साथियों सहित जिसमें कांग्रेस, जनसंघ और समाजवादी सभी तरह के लोग थे, सम्मेलन के साथ जुड़ गए। देखते ही देखते दिल्ली में चालीस हजार से ऊपर कार्यकर्ता हिन्दी-सेवा के लिए तैयार होगए। साइनबोर्डों पर हिन्दी दिखाई देने लगी। हिन्दी में टेलीफोन-डायरेक्ट्री छपने लगी। अदालती फार्म हिन्दी में छपकर तैयार होगए। सामाजिक एवं व्यापारिक संस्थानों में हिन्दी-टाइपराइटर खटकने लगे। बैंकों से लेकर सरकारी संस्थानों में आवेदन-पत्रों पर हिन्दी में हस्ताक्षर किए जाने लगे। जो दिल्ली उर्दू भाषा एवं साहित्य का गढ़ समझी जाती थी, वह हिन्दी-भाषा और साहित्य का गढ़ बन गई। मैं इसे अपना पुरुषार्थ नहीं, बापूजी का आशीर्वाद और टंडनजी के आदेश का प्रतिफलन ही मानता हूं। जहां तक प्रशासनिक क्षेत्र में सफलता का प्रश्न है, मेरे नेहरूजी से, शास्त्रीजी से, मोरारजी भाई व जगजीवन राम से निकट के संबंध थे। उन्होंने मुझे कई केन्द्रीय मंत्रालयों की हिन्दी सलाहकार समितियों का सदस्य बनाया। इन समितियों के सदस्य जहां मंत्रियों से सिर्फ अपने हित-संवर्धन की बातें किया करते थे, वहां मैंने मंत्रीगण क्या चाहते हैं और सदस्यों पर इसका क्या असर पड़ेगा, इसकी चिंता किए बिना धड़ल्ले के साथ हिन्दी के पक्ष में आवाज़ बुलंद की। इससे विभिन्न मंत्रालयों में हिन्दी-समितियों का गठन हुआ जो मंत्रालयों में हिन्दी के कामकाज की समीक्षा करने लगीं। सबसे बड़ी उपलब्धि तो आकाशवाणी से प्राप्त हुई कि विषय चाहे जो हो, आकाशवाणी से सभी उदघोषणाएं हिन्दी में होने लगीं। हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार जैसे सुमित्रानंदन पंत, भगवतीचरण वर्मा, इलाचन्द्र जोशी और उदयशंकर भट्ट आदि ही नहीं, आकाशवाणी के निदेशक-मंडल में पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी जैसे हिन्दी के प्रबल पक्षधर नियुक्त हुए। डॉ० नगेन्द्र जैसे हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक की नियुक्ति आकाशवाणी में हिन्दी के प्रचलन के लिए की गई, जिससे आकाशवाणी में हिन्दी के तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ और टिप्पणियां भी हिन्दी में होने लगीं। यद्यपि आपके प्रश्न से यह बाहर की बात है, फिर भी मैं बताना चाहता हूं-जो आकाशवाणी पहले उर्दू मुशायरों का केन्द्र थी, उससे हिन्दी-कवियों की कविताएं मुखरित होने लगीं। इनमें मैथिलीशरण गुप्त, पं. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', दिनकर, पंतजी, बच्चनजी, नरेन्द्र शर्मा जो रेडियो पर जाना पसंद नहीं करते थे, वे प्रतिवर्ष होने वाले रेडियो कवि-सम्मेलन में भाग लेने लगे। मेरी एक और उल्लेखनीय उपलब्धि यह भी रही कि जो ब्रजभाषा मध्यकाल में सारे देश की साहित्यिक भाषा रह चुकी थी तथा जो उन दिनों साहित्य और समाज से उपेक्षित हो रही थी, उसकी आकाशवाणी में प्रतिष्ठा होगई। 'ब्रज माधुरी' का अलग से कार्यक्रम होने लगा। मथुरा-वृंदावन में ब्रजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए आकाशवाणी का एक केन्द्र भी खुल गया। देखादेखी आकाशवाणी से हिन्दी की अन्य प्रादेशिक भाषाओं का प्रचार-प्रसार होने लगा। उर्दू-पंजाबी ही नहीं, गुजराती, मराठी और बंगला के साथ-साथ कर्नाटक का संगीत आकाशवाणी से गुंजायमान होने लगा। दक्षिण भारत की अनेक भाषाओं के लोकगीतों, साहित्य और साहित्यकारों को रेडियो पर सम्मान मिलने लगा। जहां तक शासन की भाषा का प्रश्न है, वहां मेरी पीढ़ी द्वारा हिन्दी के आंदोलन से मात्र इतना असर पड़ा कि शासन की प्राप्ति के लिए उत्तर-दक्षिण के सभी नेताओं ने हिन्दी के महत्व को स्वीकार तो किया, उसके माध्यम से सत्ता में भी पकड़ मज़बूत की, लेकिन शासन चलाने के लिए अंग्रेजी का पल्ला ही पकड़े रहे। इसके पीछे सरकारों की नौकरशाही ने, जो अंग्रेजीपरस्त थी, हिन्दी अथवा अन्य प्रांतीय भाषाओं को पनपने ही नहीं दिया। इसलिए मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि प्रजातंत्र में हिन्दी को प्रशासनिक भाषा बनाने का जो स्वप्न गांधीजी ने देखा था, उसे पूरा करने में हमारी पीढ़ी अभी तक सफल नहीं हो सकी है। कैसी विडम्बना है कि हमारे शासकों की मान्यता यह है कि बिना अंग्रेजी के हम ज्ञान-विज्ञान में प्रगति नहीं कर सकते ! मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन, रूस ने, जहां अंग्रेजी नहीं, अपनी भाषाएं चलती हैं, ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में क्या कम उल्लेखनीय कार्य किए हैं ? तो हम क्यों अंग्रेजी का दामन थामे हुए हैं ? क्यों अंग्रेजी प्रथम और हिन्दी एवं भारतीय भाषाएं दूसरे स्थान पर हैं ? कब तक रहेंगी ? स्वदेश में स्वभाषा का गांधीजी का स्वप्न कब पूरा होगा ? स्वतंत्रता के समय में भी क्या पूरा नहीं होगा ?

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3    4
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |