गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( श्री अशोक चक्रधर )

प्रश्न : व्यासजी, आप निराश न हों, आगे आने वाली पीढ़ी मूल्यांकन करना जानती है। लेकिन मैं एक बात जानता हूं कि व्यासजी, आप ऐसे दुलर्भ व्यक्तित्व हैं जो दोनों क्षेत्रों में समान महत्व रखते हैं। लेखन में भी और वाचिक परंपरा में भी। आपने कवि सम्मेलन के माध्यम से वाचिक परंपरा को आगे बढ़ाया और लेखन के माध्यम से पत्रकारिता में भी अपना एक स्थान बनाया। इसके अलावा आप जीवन में बड़े प्रयोगवादी भी रहे। आपने एक सिलसिला शुरू किया जो शायद ब्रज से आप लेकर आए होंगे, महामूर्ख सम्मेलन। ये सिलसिला कैसे शुरू हुआ ?
उत्तर : मैं घूमता-घामता स्वतंत्रता-आंदोलन में इटावा पहुंच गया। इटावा में श्रीनारायणजी चतुर्वेदी के पिताजी द्वारिकानाथ चतुर्वेदी के साथ मिलकर मैंने ब्रजभाषा कोश का संपादन किया। होली पर इटावा में 'नंग-नाच' हुआ करता था। इधर द्वारिकानाथ चतुर्वेदीजी ने मुझसे कहा कि तुम वहां मत जाना। बड़ा अश्लील दृश्य होता है। तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी। उधर बनारसीदास चतुर्वेदीजी का पत्र आया कि तुम इटावा आए हो तो 'नंग-नाच' अवश्य देखना और उसकी रिपोर्ट मुझे भेजना। तो मैंने नंग-नाच देखा। दिन में भी देखा और रात में भी देखा। तीन दिन देखा और उसकी रिपोर्ट बनारसीदास चतुर्वेदी के पास भेज दी। बनारसीदासजी मुझको धमकाया करते थे कि यदि तुमने कोई शरारत की या मुझसे ज्य़ादा छेड़छाड़ की तो मैं तुम्हारी रिपोर्ट छाप दूंगा। मैंने उत्तर में कहा कि ध्यान रहे मैं भी तुम्हारी ओरछा नरेश के दरबार में वेश्याओं को देखने के बाद लिखा गया लेख छाप दूंगा। याद है न तुमने लिखा था-'रूप ब्रह्मचर्य भंग भयौ......।' तो हंसी-मज़ाक में वह खेल ख़त्म होगया। मैंने इटावा में देखा कि 'नंगनाच' में बड़े-बड़े लोगों के जो काले-कारनामे थे, उनको हंसी-हंसी में दर्ज़ किया करते थे। मैंने दिल्ली में भी आकर उसकी परंपरा डाली। दिनभर के रंग के बाद शाम को मैंने बड़े-बड़े नेताओं को, बड़े-बड़े दिल्ली के साहित्यमना और बुद्धिजीवियों को मूर्ख बनाया और उनका जुलूस निकाला। उसमें हाथी-घोड़े, हिजड़े सब निकलते थे। जगजीवनराम का एक प्रसंग बताता हूं कि उनके सामने जुलूस के लोग कहते थे- मूर्ख हो तो कैसा हो ? तो जगजीवनराम अपने सीने पर हाथ रखकर कहते थे कि ऐसा हो। हमारी महामूर्खा एवं चतुर नेत्री तारकेश्वरी सिन्हा पर जब लोग फूल फेंकते थे तो वह कहती थी कि तुम बड़े अनजान मूर्ख आदमी हो, यह नहीं जानते कि फूल कहां फेंकते हैं। यहां फेंको यानी कुचों पर मारो। महामूर्ख सम्मेलन में मैं नेताओं की और बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों की पोल खोलता रहा और रिपोर्ट पढ़ता रहा। वह रिपोर्टें छपने लगीं। बिकने लगीं।

प्रश्न : महामूर्ख सम्मेलन का एक बहुत बड़ा योगदान और रहा कि आपने मज़ाक-मज़ाक में व्यंग्य-विनोद में हिन्दी का प्रचार और प्रसार कराया। नेताओं को बुलाया, नेताओं के माध्यम से हिन्दी को बढ़ाया। तब अगला सिलसिला यह बताएं कि नेताओं की सहायता से हिन्दी की विकास यात्रा में आपने क्या रणनीति अपनाई और किस तरह से हिन्दी को लाने के लिए राजनेताओं का भी संरक्षण प्राप्त किया ?
उत्तर : मैंने केन्द्रीय मंत्री राजबहादुरजी के संपर्क में आकर ब्रज में आकाशवाणी केन्द्र की स्थापना कराई और 'ब्रजमाधुरी' कार्यक्रम चला दिया। शास्त्रीजी से सहयोग पाकर मैंने टंडनजी का अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित किया और उसको प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू के द्वारा टंडनजी को भेंट कराया। उस वक्त मेरी प्रतिष्ठा में चार चांद लग गए।

प्रश्न : आज चार से ज्य़ादा चांद लग चुके हैं इस हिन्दी के भवन में। सिर्फ हिन्दी भवन में ही नहीं, हिन्दी के पूरे पर्यावरण में आपकी सुवास चारों तरफ फैली हुई है, जिसको हम कहेंगे 'व्यास की सुवास' तो उस सुवास में आपने हास्य-व्यंग्य को अपना हथियार बनाया और एक बहुत बड़ी शिष्य-परंपरा आपने विकसित की। ये बात दूसरी है कि आज आपको लगता है कि चेले और ज्य़ादा अच्छा काम करें। वे निश्चित रूप से करेंगे। आप मुझे यह बताइए कि क्या आपका मन भंग चढ़ाने और रबड़ी खाने का होता है ?
उत्तर : नहीं, अब तो सब छोड़ दिया। अब तो एक ही कामना रह गई है। पहले तो यह कामना थी कि मैं दर्ज़ा सात तक ही पढ़ा, आगे पढूं, लेकिन वह कामना पूरी नहीं हुई। बनारसीदासजी ने मुझसे कहा- "तुम किसी ऐंग्लो इंडियन लड़की से प्रेम करो तो तुम्हें अंग्रेजी आ जाएगी।'' न कोई लड़की मिली और न अंग्रेजी सीखी। लेकिन सुन-सुनकर, पढ़-पढ़कर मैं इतनी अंग्रेजी जान गया कि पी.टी.आई. की, यू.एन.आई.की खबरों का अनुवाद हिन्दी में करने लगा। अब तो एक ही कामना शेष है कि विषमताओं पर, भ्रष्टाचार पर, आतंकवाद पर एक बड़ा 'व्यंग्य-ग्रंथ' लिखूं, जिससे आज के युग की पहचान भविष्य में आने वाले लोगों को हो सके।

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