गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( श्री अशोक चक्रधर )

प्रश्न : आपकी पीड़ा बिलकुल सही है कि लिफाफे और तालियों के मोह में कवि सम्मेलन पतनशीलता को प्राप्त हुए। लेकिन व्यासजी, मेरा मानना ये है कि अभी भी ऐसे लोग हैं, वाचिक परंपरा का आपने जो मार्ग दिखाया, उस पर चल रहे हैं। आपको याद होगा आपने एक पैन मुझे दिया था। सन्‌ 64 या 65 में।
उत्तर : याद है, आप जैसे लोग ही हैं जो सच्ची कविता की ध्वजा को धारण किए हुए हैं। ऐसे ही एक दो कवि और हैं, ज्य़ादा नहीं है।

प्रश्न : प्रयास रहेगा कि ये वाचिक परंपरा जैसा आप चाहते हैं, चलती रहे और श्रेष्ठतम हो ।
उत्तर : उनमें से एक गोविन्द भी है। गोविन्द प्रारंभ से ही बड़ा मेधावी रहा है। दस वर्ष की उम्र में उसने स्वरचित कविता सुनाकर मीर मुश्ताक अहमद से, जो दिल्ली के ज़बरदस्त समाजवादी कांग्रेसी नेता थे, उनसे नकद दस रुपए का पुरस्कार प्राप्त किया और फिर तो उसकी कविताएं ऐसी लोकप्रिय हुईं कि देश में ही नहीं, विदेश में भी उसने नाम कमाया। और अब तो हिन्दी भवन का मंत्री बनकर, मेरा उत्तराधिकारी बनकर, उन्नति के शिखर पर चढ़ता चला जा रहा है। मैं उससे बहुत प्रसन्न हूं।

प्रश्न : इसमें संदेह नहीं कि गोविन्द व्यास हिन्दी भवन के माध्यम से और कवि सम्मेलन के माध्यम से श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं। लाल किले के कवि सम्मेलन आपने पच्चीस साल लगातार कराए। पच्चीस सालों के बाद ज़िम्मा प्रशासन ने ले लिया। जिस समय तक आपके पास रहे उसमें क्या गुण थे और जब आपसे अलग होगए, तब उसमें क्या अवगुण आए, इसका अंतर बताएंगे ?
उत्तर : तब उसमें कविता पढ़ी जाती थी। सच्चे एवं श्रेष्ठ कवि आते थे। पं. जवाहरलाल नेहरू आते थे, पंतजी आते थे, मैथिलीशरण गुप्त आते थे, सोहनलाल द्विवेदी आते थे, भगवतीचरण वर्मा आते थे, उदयशंकर भट्ट आते थे। अब वह कवि सम्मेलन मेरे न रहने पर भ्रष्ट होगया। मगर परंपराएं चलती ज़रूर हैं, जैसे महामूर्ख सम्मेलन चल रहा है। लेकिन बेजान होगए हैं। अब चाटुकारिता होगई है, लिफाफे के लिए कविता लिखी जाती है। कविता के लिए कविता नहीं लिखी जाती।

प्रश्न : व्यासजी, ब्रज का लीलाधाम छोड़कर रास की परंपरा, लोकनाट्य की परंपरा के जुड़ाव के बावजू़द आपका दिल्ली आना हुआ तो ये कैसे संक्रमण हुआ ? इसकी क्या कहानी है ?
उत्तर : ऐसा हुआ कि मैंने स्वतंत्रता संग्राम में 'करो या मरो' आंदोलन के दौरान कलम पकड़ ली और लिखने लगा। उन्हीं दिनों हरिद्वार में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' का वार्षिक अधिवेशन शुरू हुआ। उसमें माखनलाल चतुर्वेदी को चांदी के रुपयों से तोला गया। उस समय के सारे प्रमुख साहित्यकार आए। नगेन्द्रजी भी आए। जैनेन्द्रजी भी आए। जैनेन्द्रजी स्वयं नहीं लिखते थे। जैसे मैं बोलकर लिखवाता हूं, ऐसे ही जैनेन्द्रजी भी बोलकर लिखवाते थे। जैनेन्द्रजी का एक पत्र मुझे मिला कि व्यास, 'साहित्य संदेश' छूट चुका है और अब खाली हो, दिल्ली आ जाओ। इसके साथ सादा लिफाफे में दस-दस के पांच नोट थे। तो मैं दिल्ली आगया। घर पर राशन-पानी का इंतज़ाम करके रेल का टिकट कटाकर एक चवन्नी बची थी, उस चवन्नी से रिक्शा करके मैं दरियागंज पहुंचा। जैनेन्द्रजी के यहां। जैनेन्द्रजी के पास बैठकर कहानियां लिखवाने लगा। लिखते-लिखते मुझे भी कहानी लिखना आगया। मैंने भी कुछ कहानियां लिखीं। उसके बाद जैनेन्द्रजी ने कहा कि लाओ, मैं इनमें संशोधन कर देता हूं, मैंने दे दीं। बाद में मैंने देखा कि हेर-फेर करके जैनेन्द्रजी ने वे अपने नाम से छपा दीं। ऐसे ही प्रभुदयाल मीतल ने मेरी नायिका भेद, नख-शिख वर्णन की पुस्तक (जब मैं स्वतंत्रता आंदोलन में आगया था) अपने नाम से छपा लीं। मेरा ऐसा भी शोषण हुआ।

प्रश्न : यह तो साहित्य की अंतर्कथाएं हैं। ऐसी चीजें होती रहती हैं। किसी को बढ़ाते हैं उस्ताद लोग तो वे थोड़ी-सी उस्तादी दिखा ही देते हैं। लेकिन जब आप दिल्ली आए तो पहले आप किन्हीं के गणेश बने। फिर देवराजेन्द्र आपके गणेश बन गए। ये तो एक परंपरा है, सिलसिला है, जो आगे चलता रहता है। एक अंतर्कथा आप बताएं, जैनेन्द्रजी के पास आने के बाद आप 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में कैसे आए ?
उत्तर : जैनेन्द्रजी के साथ ज्य़ादा दिन नहीं पटी और तय हुआ था कि दोनों लिखेंगे और आधा-आधा बांट लेंगे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो मैंने छोड़ दिया। उपेन्द्रनाथ 'अश्क' और नगेन्द्रजी ने उनको समझाया तो वह बाल खींचने लगे, रोने लगे कि मैं पापी हूं, मुझसे ग़लती हुई है। व्यास को समझाओ। उन्होंने मुझे समझाया, लेकिन मैं तो छोड़ने का निश्चय कर चुका था। छोड़कर चल दिया और फ्रीलांस करने लगा। नई सड़क पर किताबों की कुंजियां लिखने लगा। रस, अलंकार, छंद पर चार्ट लिखने लगा। 'साहित्य प्रभाकर' आदि में लगने वाली पुस्तकों की मीमांसा करने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाने लगा। रेडियो में जाने लगा, 'हिन्दुस्तान' में मेरी कविताएं छपने लगीं। तो एक दिन देवदासजी का एक मनीआर्डर मुझे मिला। कर्मचारियों को तो बोनस मिलता है, लेकिन लेखन के रूप में मुझको 200/- रुपये का उन्होंने बोनस भेजा। मैं गदगद होगया कि लेखक को भी बोनस मिलता है। सस्ता साहित्य मंडल के मंत्री मार्तण्ड उपाध्याय का नाम आपने सुना होगा। उनके कहने से एक रोज़ देवदासजी ने मुझे चाय पर बुला लिया और कहा कि हम ज्य़ादा तो आपको दे नहीं सकते, 80 रुपये देंगे, आप 'हिन्दुस्तान' में काम करो। हम वार्षिक वृद्धि भी करते हैं और बोनस भी देते हैं। धीरे-धीरे बढ़ जाएगा। मैंने जैनेन्द्रजी से परामर्श किया तो उन्होंने कहा कि इस बड़ी प्रैस की चक्की में पिस जाओगे। परंतु बाक़ी मित्रों ने कहा कि अवश्य जाओ। 80 रुपये पर मैं 'हिन्दुस्तान' में काम करने लगा। दिन और रात में डयूटी करने लगा। देवदासजी को मालूम हुआ तो उन्होंने कहा कि नहीं व्यास को दिन और रात की ड्यूटी के लिए नहीं, साहित्य संपादक बना करके मैग्ज़ीन सैक्शन में भेज दो। फिर जब पद्मश्री मिली तो मुझे सह-संपादक बना दिया गया। वहां पर मैंने 'यत्र-तत्र-सर्वत्र' लिखा, 'नारदजी खबर लाए हैं' लिखा, राजस्थान पत्रिका में 'बात-बात में बात' लिखा और आगरे के दैनिक पत्र 'विकासशील भारत' में 'चकाचक' लिखा। ऐसे स्तंभों में मैं समाज की विकृतियों, विषमताओं एवं आज की परिस्थितियों को लिखता चला आया हूं।

प्रश्न : बहुत बड़ी बात है कि आप आज तक लिखते चले आ रहे हैं ।
उत्तर : नारदजी को पचास वर्ष से ऊपर होगए, अगर कोई मुझे भी रवीन्द्रनाथ जैसा प्रमोटर आज मिल जाए तो मैं भी, मेरा नाम भी सर्वोच्च पुरस्कार के लिए आ सकता है, लेकिन ऐसा कोई नहीं मिला।
| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
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