गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( श्री अशोक चक्रधर )

प्रश्न : ये आपका वह काल था जिसमें आप सीख भी रहे थे, साहित्य का ज्ञान भी प्राप्त कर रहे थे। आप तरह-तरह के हुनर अपने अंदर विकसित कर रहे थे और आपने बताया कि आप कम्पोजीटर थे। इसकी शुरूआत कैसे हुई और इसमें कौन आपके गुरु थे। इस बारे में बताएंगे व्यासजी ?
उत्तर : हमारे मंदिर के पास एक दूसरा मंदिर है कृष्ण-बलदेव का। उसमें पुजारी थे गोपीनाथ। वह एक दिन मेरे पास आए, बोले-"गोपाल दम लगाने के लिए मुझे एक चवन्नी की ज़रूरत है।'' उस समय तक मेरा विवाह हो चुका था। घर में खाना बनाने वाला कोई नहीं था, तो मेरा ब्याह कर दिया गया। ब्याह करके आवश्यक बर्तन-भांडे देकर और एक रुपया महीने के किराए वाला एक टूटी छत वाला मकान देकर मुझे अलग कर दिया गया। एक रुपया मेरे पास था। मैंने उसमें से एक चवन्नी उनको दे दी। मैंने कहा- "गोपीनाथजी, आप मुझे कम्पोजीटरी सिखा दें।'' वह बोले, "मैंने बड़े-बड़े लोगों को कम्पोजीटरी सिखा दी, तू तो घर का है, कल से आ जाना।'' मैं काशीनाथ प्रिटिंग प्रैस में जाने लगा। आठ पेजों के लिए चार रुपए मिलते थे। मैं टाइप-खानों को पहचानने लगा कि किसमें कौन-सा है ? 'अ' किसमें है, 'क' किसमें है। मात्रा किसमें हैं, स्वर किसमें है। तभी पास में बैठे कम्पोजीटर ने मेरे हाथ में संटी मारी। बिना मिठाई खिलाए तू ये क्या चुनने में लगा है ? पहले मिठाई खिला। अगले दिन मैंने उस एक रुपए में से आठ आने के पेड़े लाकर बंटवा दिए। आठ पेजों के चार रुपए जो मिलने थे। पहले मैंने चार पेज किए, फिर छह पेज किए, फिर आठ पेज तक करने लगा। चार रुपए मिलने लगे। परंतु गुरु तो गुरु निकले। वह उसे अपने हिसाब में डालने लगे। मुझको धेला भी नहीं मिला। तो ऐसे मेरी कम्पोजीटरी की शुरूआत हुई।

प्रश्न : मैं समझता हूं कि यही वो प्रस्थान बिंदु था जहां से आप पत्रकारिता में भी प्रविष्ट हुए और कम्पोजिंग करते-करते, अख़बारों के लिए फौंट लगाते, उन लेखों को सजाते-संवारते। आपके अंदर पत्रकार ने जन्म लिया। जब आपका पत्रकार जन्म ले रहा था, तब प्रारंभिक रचनाएं आपकी किस प्रकार की थीं ?
उत्तर : ऐसा है कि मैं आगरे में बाबू गुलाबरायजी के साथ 'साहित्य-संदेश' में सह-संपादन करता था। तब मुझे ब्रज की कविता भी आती थी। उनके सुझाव से गुलाबरायजी की 'हिमाक़त' नामक पुस्तक पढ़ता था। मैं नई-नई कविता लिखने लगा, मेरी पहली कविता का विषय था -'ओ बाबूजी की डबल भैंस !' ऐसी चार कविताएं मैंने लिखीं तो 'वीणा' के संपादक कालिकाप्रसाद एक दफ़ा 'साहित्य-संदेश' के दफ्तर में आए और उन चारों कविताओं को ले गए और 'वीणा' में उनको छाप दिया। फिर माखनलाल चतुर्वेदी के संपर्क में आया। अब मैं देशभक्ति की कविता भी लिखने लगा। उनको वह छापने लगे। बाबूजी की प्रेरणा से मैंने द्विवेदीजी की 'रसज्ञ रंजन' नामक पुस्तक का संपादन किया। नगेन्द्रजी के साथ पांडुलिपियों पर काम किया। इसी तरह मैं कवि-लेखक से पत्रकार बन गया। मेरी गुरु-भाषा की कविता कैसी होती थी। कहें तो उसका एक उदाहरण सुना दूं- "कांटों ने मुझे खुशबू दी है।'' "आम के नीचे मयूर का नाच".....................

प्रश्न :
'वीणा' में आपकी कविताएं छपीं और माखनलाल चतुर्वेदीजी भी आपकी कविताएं छापने लगे। आपने ब्रजभाषा की कविता से प्रारंभ किया अपना लेखन या खड़ी बोली की कविता से ?
उत्तर : ब्रजभाषा में कविता लिखना शुरू किया। क्योंकि वही मेरी मातृभाषा और मेरे संस्कारों में रची-बसी थी।

प्रश्न : कौन-सी कविता थी वह ?
उत्तर : पावस वाली थी। खानपान के विषय में थी। आपने यह नहीं पूछा कि आप क्या खाते थे ?

प्रश्न : तो लगे हाथ यह भी बता दीजिए !
उत्तर :
भोजन में भात होय, घी से मुलाकात होय,
दही-बूरा साथ होय, दाल अरहर की।
हरो कछु साग होय, चटनी की लाग होय,
फूले-फूले फुलका, परोसे जाए घर की।
रबड़ी जो मिल जाए कहूं, फिर
हमें चाहना, ना विधि हरि हर की।

प्रश्न : ब्रज के आपके जो पूरे संस्मरण हैं, उनमें तो अनन्तकाल तक आप आनंदित होकर हमें बताते रह सकते हैं। मुझे लगता है कि महावीरप्रसाद द्विवेदी की जो भूमिका थी हिन्दी साहित्य में लगभग वैसी ही भूमिका आपकी भी रही है। क्योंकि महावीरप्रसाद द्विवेदी कवियों की सर्जना करते थे कि कवियों को कैसा लिखना चाहिए, कवि क्या लिखें और कैसे विषय चुनें ? कवि सम्मेलनों के माध्यम से आपने भी वही भूमिका निभाई है, क्योंकि कवियों की एक पूरी ज़मात आपने पैदा की है। आपके इर्द-गिर्द जो कवि आए उनको आपने किस प्रकार की कविताएं लिखने की प्रेरणा दी ?
उत्तर : उनको मैंने वास्तव में कविता क्या है, यह बताया और कुछ कविताएं लिखकर उनको दीं भी। पहले मंच पर कविता ही पढ़ी जाती थी, अब नहीं पढ़ी जाती। अब तो कविता के नाम पर नौटंकी होती है। कविता का भी उद्योग बन गया है। लिफाफे के लिए लिखी जाती है। जो मेरे पक्के शिष्य थे, उन्हीं लोगों ने इस कविता को भ्रष्ट कर दिया। महावीरप्रसाद द्विवेदी के बनाए हुए शिष्य तो मैथिलीशरण आदि राष्ट्रकवि होगए। मेरे शिष्य विदूषक होगए और भंडैती करने लगे। वे कविता क्या है, उसको भूल गए। ताली पिटवाना ही उनका परम धर्म रह गया। लिफाफा पाना ही उनका उद्देश्य होगया। कवि सम्मेलन अब रहे ही नहीं, धंधा होगए हैं।

प्रश्न : लेकिन व्यासजी, इसकी शुरूआत तो आपने ही की थी। पैसा दिलवाना तो आपने शुरू किया था। लाल किले के मंच पर जब कवि आते थे तो आप ही नेपथ्य में सबको लिफाफे दिलवाते थे। आप ही उनके लिए ताली बजवाते थे।
उत्तर : मैं उनको उतना ही देता था-गुज़ारे लायक। उनके आने-जाने का किराया, खाने-पीने का खर्चा दिलवाता था। आज की तरह हजारों रुपए नहीं। दो सौ, तीन सौ रुपए से ज्य़ादा मैंने किसी को नहीं दिए।

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