गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( श्री अशोक चक्रधर )

प्रश्न :यह दृश्य बड़ा मार्मिक है, व्यासजी ! इसको तो सुनकर भी सिहरन हो रही है कि मां अपने बालक से मिलने के लिए कैसे-कैसे भटकती हुई आती थी। मुझे लगता है, यही पीड़ा आपके लेखन में झलकती है। जब आप पत्नीवाद, सालीवाद अपनी कविता में लाते हैं और महिलाओं को प्रवंचनाओं से भरा हुआ पाते हैं। क्या ऐसा है ?
उत्तर : एक बार की बात बताता हूं, संवत्‌ 1981 में बड़ी जबरदस्त बाढ़ आई और एक लोकगीत प्रचलित हुआ था- "संवत्‌ इक्यासी की साल, हाल कुछ कहा न जाता है, डूब गए सारे सात बाजार, छत्ता और नया बाजार देख दिल धड़का खाता है।'' तो वह बाढ़ का पानी विश्राम घाट पर हमारा जो राधा दामोदर का मंदिर है, यद्यपि वह ऊंचाई पर है, लेकिन उसमें भी भर गया और तहख़ाने में भी पानी घुस गया। कीचड़ ही कीचड़ होगई। दीवारें फट गईं। पिताजी बाहर थे। चाचाजी ने चिट्ठी लिखी नानाजी को कि गोपाल की मां को भेज दो। नानाजी इक्के में मां को बिठाकर चल दिए। वहां भी बरसात का मौसम था। एक शालिग्राम का तालाब था जिसका पानी सड़क पर भी आगया था। घोड़ा इक्के सहित उस तालाब में घुस गया और मां लहंगा पहने हुए थी। लेकिन तैरना जानती थी, उसने नानाजी को धक्का देकर नीचे उतार दिया। वह तो बच गए, परंतु मां इक्के के साथ ही डूबती हुई चली गई। तत्काल नाना दौड़ पड़े। नानाजी, जो राजा भरतपुर के बड़े प्रिय पात्र थे, उन्होंने कहा राजा तेरी दुहाई है, मेरी बेटी डूब गई है, बचाओ उसको। राजा ने हाथी भेजा तो हाथी पर बैठकर मां लौटकर आगई। लौटकर आई तो मुझे छाती से लगा लिया। हाय ! आज मैं मर गई होती तो मेरे गोपाल का क्या होता ?

प्रश्न : अभी आप बता रहे थे कि विश्राम घाट पर जो आपका मंदिर है, उसमें पानी घुस आया था, तो विश्राम घाट के मंदिर के बारे में कुछ बताइए। वहां पंडे होते होंगे। भक्त होते होंगे। आरती होती होगी। थाल सजता होगा।
उत्तर : वह सब बंद होगया था। बाज़ार में भी पानी भर गया था। लक्ष्मीनारायणजी की ऊंची टेक पर से आरती होती थी। सब पंडे और पुजारी भाग गए थे। एक भी नहीं बचा था। बात तब की है जब दादी ने मुझे रख लिया और मां चली गई। पितृभक्त पिताजी मौन रहे, कुछ नहीं कहा। लेकिन जब मथुरा आगए और सैटल होगए तो अम्मा अपने भाई को लेकर आई। पिताजी ने कहा कि तू इतने वर्ष मुझसे अलग रही, अब तेरी पवित्रता पर मैं कैसे विश्वास करूं ? अंगीठी जल रही थी, उसमें से कोयले निकालकर कहा- "हाथ पसार, तेरे हाथ पर कोयला रखकर देखता हूं , जल जाएगी तो समझूंगा कि तू भ्रष्ट है, नहीं जलेगी तो तू सती है।'' मां ने हाथ पसार दिए और वो कोयला राख होकर गिर पड़ा और जब वह सत्य साबित होगई तो पहला काम यह किया कि मां ने मुझे छाती से लगा लिया। हाय ! अगर मैं जल गई होती और कलंकिनी सिद्ध होगई होती तो अपने पाए हुए गोपाल को खो नहीं देती क्या ?

प्रश्न :
तब आप कितने बड़े थे, व्यासजी !
उत्तर : उस समय मैं बारह-तेरह बरस का था।

प्रश्न :
आपके मन में मातृभक्ति इतनी ज्य़ादा रही है, उस समय आप अपने आपको इस योग्य पाते थे कि पिता से अपनी मां के पक्ष में कुछ कह सकें ?
उत्तर : पिताजी के सामने बोलने का साहस मुझमें नहीं था, लेकिन मैं अनुभव करता हूं कि मैं कितना अभागा हूं कि मां का प्यार न पा सका। वह बीमार रहती थी। मैं न उसकी कोई सेवा कर सका, न देखभाल। उसने गोपाल-गोपाल कहते-कहते ही प्राण छोड़ दिए, लेकिन गोपाल ऐसा कर्महीन निकला कि रुग्ण मां की सेवा, सहायता कुछ नहीं कर सका।

प्रश्न :
आज भी आप इतने भावुक हैं कि हम सब भावुक हो सकते हैं आपकी इस कहानी को सुनकर। व्यासजी ! इससे यह बात सिद्ध होती है कि जितने भी महान रचनाकार संसार में हैं उनको कहीं न कहीं पीड़ाओं के दंश एक से ज्य़ादा मिले हैं। मां के पक्ष से आपकी जो यह पीड़ा है, यह आपने सुख बांटकर, दूसरों को सुख देकर पूरी की। मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि साली पर लिखी हुई कविता, घरवाली पर लिखी हुई कविता, पत्नीवाद, ये सब मां के प्रति जो आपकी प्रवंचनात्मक स्थितियां रही हैं, उससे हुआ है क्या ? हम थोड़ा सहज करें, क्योंकि रोने को मन कर रहा है आपकी बातें सुनकर। आपने जो पत्नीवाद वाली कविताएं लिखना शुरू कीं, वो किस ज़माने में शुरू कीं ?
उत्तर : जब अंग्रेजों का राज था। उन दिनों कोई अंग्रेजों के संबंध में चूं तक नहीं कर सकता था। जो बोलता था तो उसका मकान, दुकान, व्यवसाय सब कुर्क हो जाता था। तब मैंने पत्नी को माध्यम बनाकर कविताएं लिखीं। उन दिनों राशन पर लिखा, कंट्रोल पर लिखा- "हे मजिस्ट्रेट महाराज ! हमारी पत्नी पर कंट्रोल करो। घी, तेल, सूजी, माचिस तक पर कंट्रोल हुआ। तो ये ही क्यों बचें। प्रभुजी इसका भी कुछ मोल करो।'' (पत्नी को परमेश्वर मानो)। यह पत्नीवाद नहीं है। यह तो समाज-परिष्कार था अंग्रेजों के विरुद्ध देश का, असहयोग था देश छोड़ने के लिए। धीरे-धीरे इसको लोगों ने पत्नीवाद कहना शुरू कर दिया। लेकिन कुछ आलोचकों ने इसे पत्नीवाद नहीं, परिवार-रस कहा। अब जो भी कुछ हो, आपसे मेरा अनुरोध है कि मेरी एक पुस्तक आ रही है 'व्यंग्यायन'। उसमें मैंने पत्नी के संबंध में जो वास्तविकता है, बताई है। पत्नी मेरी नहीं, उसकी है, इसकी है, ज़माने की है, जगत की है, पुरातन नहीं, नूतन है। ऐसा लिखकर अपनी कैफ़ियत दी है।

प्रश्न :
मेरी अब बात समझ में आती है और आलोचक भी एक चीज को एक स्तर तक लेते हैं और उसकी गहराई में नहीं जा पाते हैं। आपका जो ये परिवारवाद है, यह मूलतः राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम आंदोलन का एक बहुत बड़ा औज़ार था, जिसको परिवार के माध्यम से आपने सरकार तक पहुंचाने का एक उपक्रम किया। अभी तक बात हो रही थी आपकी मां के बारे में, उस बाढ़ के बारे में, जिसमें आप भी डूबे हुए थे, लेकिन बचे हुए थे और आपका बचना उनका काव्य था। उनका साया कब तक आपके ऊपर रहा ?
उत्तर : लगभग पंद्रह साल वह रही और उसको क्षयरोग होगया। उस समय क्षयरोग का इलाज नहीं निकला था। निकला होगा तो मथुरा तक नहीं पहुंचा था। पिताजी ने अस्पताल में भी भेजा। फिर उसको सबसे दूर करने के लिए एक अलग जगह में ही रखा गया। फिर मेरी नानी उसे अपने साथ लिवा ले गई। राधाकुंड में ही पैदा हुई और राधाकुंड में ही "राधे, राधे, गुपाल,गुपाल। मेरे गुपाल को बुलाओ, मेरे गुपाल को बुलाओ !'' कहते-कहते उसने अपने प्राण त्याग दिए। मैं ऐसा अभागा रहा कि न तो मां की सेवा कर सका और न उसके कोई काम आ सका। क्योंकि तब मैं इस योग्य ही नहीं था। कोई नौकरी नहीं, कोई चाकरी नहीं। आवारा जीवन बिताता था। शतरंज खेलता था। चौपड़ खेलता था। कुश्ती लड़ता था। फिर जिन दिनों मैं चम्पा हाईस्कूल में पढ़ता था, तब सत्येन्द्र नाम के एक वरिष्ठ हिन्दी-विद्वान से भेंट हुई। वह बड़े प्रभावित थे मेरी कविताओं से, जो अक्सर अख़बार में छपती थीं। एक दिन मैं अखाड़े से लौट रहा था, हाथ में गजरा बंधा हुआ था। उन्होंने मुझे देखकर कहा कि "गुपाल, तुम इसके लिए पैदा नहीं हुए हो। तुम मेरे पास आओ। जो करना है, मैं करूंगा।'' तो वह रात के नौ बजे से रात के ग्यारह-बारह बजे तक मुझे पढ़ाते थे। स्कूल की पढ़ाई तो दर्जा़ छह तक ही हुई। लेकिन उन्होंने 'विशारद' कराया, 'साहित्य-रत्न' कराया और 'साहित्य संदेश' में मुझे सह-संपादक बनाया। बाद में तो मैं संपादक ही बन गया।

प्रश्न :
व्यासजी, आप मुझे बताएंगे कि आपके जो पहले रोज़गार थे, बचपन की क्रीड़ाओं के बाद, मां की गोदी से निकलने के बाद, जो आपके प्रारंभिक रोज़गार थे, वे क्या थे ?
उत्तर : पहले कम्पोजीटर था, कम्पोजीटर से प्रूफरीडरी की, प्रूफरीडरी से मशीनमैनी हुई। मशीनमैनी से कागज का ज्ञान हुआ। फिर प्रेस की कला से पूरा परिचित होगया और हां, तब हमारे यहां कचहरी में म्यूज़ियम था। इसमें प्राचीन मूर्तियां आदि अनेक अदभुत वस्तुएं रखी जाती थीं। मैंने भी उसमें सहयोग किया और मेरे द्वारा दी हुई मूर्तियां, तोरण, स्तंभ आदि आज भी नए म्यूज़ियम में सुरक्षित हैं। वासुदेवशरणजी ने मुझे सिखाया कि कागज कितने प्रकार के होते हैं। जैन-कला क्या और बौद्ध-कला क्या है ? पोद्दारजी ने मुझको अलंकार, रस, रीति, लक्षणा, व्यंजना आदि बताए। जगन्नाथदास 'रत्नाकर' आदि का काव्य पढ़ा, जो साहित्य की परंपरा है। लेकिन उसका प्रयोग मैंने अपने साहित्य में नहीं किया। अनजाने में आगया हो तो आगया हो। मैंने अलंकार के लिए अलंकार नहीं लिखे। रस के लिए रस नहीं लिखा। रीति के लिए रीति नहीं लिखी और लिखा आज की परिस्थितियों पर, आज की विषमताओं पर, आज की कुमति पर, भ्रष्टाचार आदि पर।


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