गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

( श्री अशोक चक्रधर )

       
ब्रज के प्यारे, दिल्ली के दुलारे : व्यासजी हमारे

       

प्रश्न : व्यासजी, 'कहो व्यास कैसी कटी' के माध्यम से आपने हमको अपनी व्यथा तो दे दी, अब व्यथा की कथा में यह बताइए कि मैंने उसमें पढ़ा था कि बीस साल की उम्र तक आपने बनियान नहीं पहनी। इसके दो कारण हो सकते हैं, या तो आप ब्रज-संस्कृति में पले थे, वहां कोई बनियान पहनता ही नहीं था या कोई अभाव था, विपन्नता थी या क्या था ?
उत्तर : अभाव नहीं था। नंगे पैर चलना और कम से कम कपड़े पहनना ब्रज की परंपरा रही है। मैंने बनियान क्या, कोई भी अधोवस्त्र जो बच्चे इस उम्र में पहना करते हैं, मैंने नहीं पहने, क्योंकि ब्रज की संस्कृति और ब्रज मेरे रोम-रोम में बसा हुआ है। ब्रज की मस्ती, ब्रज की लीला, ब्रज की ज़िदादिली, ब्रज का विनोद ही मेरे साहित्य की, व्यक्तित्व और कृतित्व की जान है।

प्रश्न : इसमें कोई संदेह नहीं। बालकृष्ण का रूप जब हम देखते हैं कि करधनी बंधी हुई है, बनियान-कच्छे वह भी कहां पहनते थे। जैसे बालकृष्ण की छवि संस्कृति की ओर ले जाती है, जहां हम करधनी बांधते हैं, काला डोरा पहनते हैं या दिठौना लगाती है मां। तो कुछ जो अंग पर होता था वह क्या होता था- डोरा, दिठौना या करधनी ?
उत्तर : इस संदर्भ में तुलसीदासजी का एक पद्यांश देने लायक है कि "ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनिया, किलक किलक उठत धाय, गिरत भूमि लटपटाय.........'' तो ऐसा ही बस मेरे साथ हुआ है कि मेरी मां मुझको पैंजनिया पहनाकर नचाते-नचाते दादी के पास भेजती थी और दादी कहती थी कि अब तू बिना सहारे के नाचता-नाचता अपनी मां के पास जा, तो गिरता-पड़ता मां की गोद में जाकर छिप जाता था। ये तो ब्रज की संस्कृति है, कोई अभाव नहीं है।

प्रश्न : मां के बारे में आपकी स्मृतियां कैसी हैं ? मां के पास जब आप "बाजत पैंजनिया ठुमक चलत रामचंद्र'' के अंदाज़ में जाते थे और मां की गोदी में छिप जाते थे तो मां का वत्सल भाव निश्चित रूप से पाते थे। मां के किन गुणों को आप आज भी याद करते हैं ?
उत्तर : आपको इसकी भूमिका जाननी चाहिए कि मेरी मां जिसे मैं जीजी कहता था, सम्पन्न मायके वाली जैसी थीं, वहां पनिहारा भी था, चक्की पर आटा पिसता था और घर में नौकर-चाकर भी थे। लेकिन हमारे गांव में न चक्की थी और कुंआ तीन मील दूर पड़ता था, तो मेरी जीजी को पीसना भी पड़ता था, पानी भी भरना पड़ता था। तब उसे अपने मायके की सुध आती थी और वह कहती भी थी हमारे मायके में तो ऐसा है, यहां ऐसा नहीं है। तो मेरी दादी ने कहा कि जा अपने मायके में ही रह। देखते हैं मायके वाले तुझे कितने दिन रखते हैं। तो मुझको तो दादी ने छीन लिया और मां मेरी मायके चली गई। लेकिन मां ब्रज की परिक्रमा के बहाने गांव में आती थी और अपनी पुरानी सहेलियों से कहती थी कि मेरे गोपाल को कैसे भी मुझे दिखा दो। तब वह मुझे गोद में उठाकर खिड़की से दिखा देती थीं और मां विह्‌वल होकर मुझे देखती और लौटकर चली जाती थी।


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