गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

प्रश्न : आपका कवि-सम्मेलनों से बड़ा गहरा संबंध रहा है। आप तो कवि-सम्मेलनों के राजा रहे हैं। आप जहां जाते थे बहुत जमते थे। लोग बड़े ध्यान से आपकी कविताएं सुनते थे। तो कवि-सम्मेलनों के कुछ संस्मरण अथवा अनुभव सुनाइए।
उत्तर : मैंने रंगून से लेकर काहिरा तक कविता-पाठ किया है। देश का कोई शहर या विकसित कस्बा ऐसा नहीं है जिसमें मैंने कवि-सम्मेलन में भाग न लिया हो। सैकड़ों कवियों को मैंने मंचीय कवि बना दिया। क्या नीरज, क्या बैरागी, आदित्य, संतोषानंद, काका हाथरसी, अल्हड़, हुल्लड़ सब आगे बढ़ गए हैं। मेरा प्रथम लक्ष्य कवि-सम्मेलनों के माध्यम से हिन्दी का प्रचार करना था। कवि-सम्मेलन से ख्याति मिलती थी, पैसा भी मिलता था। दक्षिण भारत में भी मैंने यात्रा की। हिन्दी कविता और हिन्दी में भाषण दिए। खूब सुने और सराहे गए। बंगाल में, महाराष्ट्र में, आंध्र में अहिन्दी क्षेत्रों में भी दौड़-दौड़कर जाता था। अलीगढ़ में मुसलमानों के गढ़ में भी मैंने हिन्दी कविता-पाठ, हिन्दी का प्रचार किया है।
प्रश्न : व्यासजी, हजारीप्रसाद द्विवेदीजी की प्रेरणा से जो व्यंग्यात्मक कविताएं आपने लिखी हैं, उन्हें सुनने की ललक मेरे मन में है। कृपया उनमें से कोई एक कविता सुनाइए।
उत्तर : सुनिये ..........
बोए गुलाब
आंसू नीम चढ़े
खून पड़ा काला !
कानों में लाख जड़ी
जीभ पर छाला !
और तुम कहते हो, हंसो !
सड़ी हुई सभ्यता पर फब्तियां कसो !
कागज की व्यवस्था चर गई,
स्याही
सफेद को काला करते-करते
गुज़र गई !
चश्मे ने
कर दिया देखना बंद,
और कलम !
अपनी मौत खुद मर गई
और तुम कहते हो लिखो ?
समाज में बुद्धिजीवी तो दिखो !
छिलके-पर-छिलके
पर्त-पर-पर्त
काई ओर कीचड़
गर्त-ही-गर्त
और तुम कहते हो उठो और चलो !
बहारों का मौसम है
मचलो, उछलो !

बोए गुलाब, उग आए कांटे !
सांपों और बिच्छुओं ने
दंश-डंक बांटे,
नागफनी हंसी,
तुलसी मुरझाई !
खंडित किनारों पर
लहरों की चोटें,
और तुम कहते हो नाचो,
युग की रामायण का
सुंदरकांड बांचो !
कुंभकरणी दोपहरी, मंदोदरी सांझ,
रात शूर्पणखा-सी बेहया, बांझ,
मेघनाद छाया है
दसों दिशा क्रुद्ध !
चाह रहीं बीस भुजा
तापस से युद्ध
और तुम कहते हो
सृजन को संवारो !
कंटकित करीलों की
आरती उतारो !
प्रतिभा के पंखों पर
सुविधा के पत्थर !
कमलों पर जा बैठे नाली के मच्छर !
गमलों में खिलते हैं
कागज के फूल !
चप्पल पर पालिश है,
टोपी पर धूल !
और तुम कहते हो आंसू मत बोओ !
सुमनों को छेद-छेद माला पिरोओ !
दफ्तर में खटमल की वंश-बेल फैली
कुर्सी पर बैठ गई चुपके से थैली !
बोतल से बहती है गंगा की धारा,
मंझधार सूख गई, डूबता किनारा !
द्रौपदी ने जुए में धर्मराज हारा !
अर्जुन से गांडीव कर गया किनारा !
और तुम कहते हो
छोड़ दो निराशा ?
होने दो होता है
जो भी तमाशा ?
प्रश्न : व्यासजी, आपने अपने व्यस्त समय में से इतना समय दिया इससे हम लोग बहुत लाभान्वित हुए। मैं समझता हूं कि आपसे जो संक्षिप्त वार्त्तालाप हुआ, इसका एक महत्व होगा और लोग भी लाभान्वित होंगे। यह मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे साहित्य मनीषी और हिन्दी के अनन्य और अन्यतम सेवक के साथ बैठने का अवसर मिला। मैं आपके प्रति अपनी ओर से और हिन्दी समाज की ओर से कृतज्ञता व्यक्त करता हूं और अपनी ओर से आभार प्रगट करता हूं।
उत्तर : त्रिपाठीजी, आपकी कृपा है जो आप ऐसा मानते हैं। मैं तो एक साधारण जीव हूं, बिना पढ़ा-लिखा और गुरुजनों के आशीर्वाद से आगे बढ़ा हुआ आदमी हूं। आप जैसे मित्रों की प्रेरणा से मेरे व्यक्तित्व और साहित्य का निर्माण हुआ है। ऐसी ही प्रेरणा और प्रोत्साहन मुझे देते रहेंगे तो जीवन के जो थोड़े वर्ष रह गए हैं, उसमें भी मैं सक्रियता से काम करता रहूंगा।

त्रिपाठीजी : आप आशीर्वाद दीजिए व्यासजी, मैं चरण स्पर्श करता हूं।

-*-  इति शुभम्  ‌-*-

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