गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

प्रश्न : व्यासजी, 'ब्रज विभव' के अतिरिक्त आपके यश का एक और जो स्तंभ है दिल्ली में। आपके बहुत दिनों बाद तक यह यश का स्मारक बना रहेगा। वह है 'हिन्दी भवन'। मेरी समझ से 'हिन्दी भवन' जैसा दूसरा भवन शायद भारतवर्ष में कहीं हो। मेरी समझ से शायद शान्ति निकेतन में ऐसा 'हिन्दी भवन' स्थापित किया था आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी। लेकिन आप जानते हैं कि हमारे संविधान में राष्ट्रभाषा हिन्दी होते हुए भी हिन्दी के नाम पर दिल्ली में, राजनीतिज्ञों में कोई उत्साह नहीं दिखाई पड़ता। आपने ऐसी स्थिति में दिल्ली में शानदार 'हिन्दी भवन' बनाया, जो इस समय बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा है। इसके बारे में जानना चाहता हूं।
उत्तर : इसका भी संस्मरण सुन लो, कहानी सुन लो। मैं तो 'ब्रज साहित्य मंडल' में काम करता था। लेकिन टंडनजी की निगाह मुझ पर शुरू से ही थी। तो एक बार मैं बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' जी के सभापतित्व में, सहारनपुर में, एक कवि-सम्मेलन में भाग ले रहा था। तब मुझे टंडनजी का तार मिला कि, 'तुम दिल्ली आओ, आवश्यक काम है।' तो मैं दिल्ली आ गया। तो मौलिचंद शर्मा ने कहा कि तुम 'दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन' का मंत्रीपद संभाल लो। तो मैंने इस विषय में टंडनजी से परामर्श किया तथा उनकी आज्ञा से 'दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन' संभाल लिया। टंडनजी के संपर्क से बढ़ता ही चला गया। ऐसा बढ़ा कि वे मुझे 'अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन' का मंत्री बनाना चाहते थे, परंतु मैं नहीं बना। मैंने कहा कि मैं इलाहाबाद के चक्कर में नहीं पड़ता। इसके बाद मैंने और शास्त्रीजी ने (श्री लालबहादुर शास्त्री) 'टंडन अभिनंदन ग्रंथ' तैयार किया और उन्हें भेंट किया। तब से टंडनजी से संबंध और प्रगाढ़ होगए।
मृत्यु-शैय्या पर जाने से पहले उन्होंने मुझे बुलाया। तो मैं गया तो मुझसे कहा, "मेरा हाथ छूकर के एक बात कहो।'' मैंने कहा, "बाबूजी, आज्ञा करो, हाथ क्या चरण छूता हूं।'' तो कहा, "मैं चरण किसी को नहीं छूने देता। मैं यह चाहता हूं कि जब तक तुम हो, तब तक दिल्ली में हिन्दी का काम करते रहो और दूसरी बात ये है कि दिल्ली में हिन्दी चलेगी तो देश में हिन्दी चलेगी, और दिल्ली में हिन्दी का एक घर होना चाहिए।'' तो मैंने टंडनजी की प्रेरणा से 'श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास समिति' बनाकर यह हिन्दी भवन खड़ा किया है।

प्रश्न : पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी से आपका परिचय कैसे हुआ ?
उत्तर : मैंने बताया न कि मैंने एक लेख उनके पास भेजा था कि यह कैसा है, जानने के लिए। तब उन्होंने मुझसे बिना व्यक्तिगत परिचय के, उन्होंने उस लेख को पंसद किया, इससे परिचय बढ़ता चला गया। फिर शांति निकेतन से हिन्दी की पत्रिका निकालने का विचार आया तो उसके लिए उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि, "आ जाओ, 'साहित्य संदेश' का काम बहुत कर लिया। बंगाल में बैठकर हिन्दी का काम करोगे तो अखिल भारतीय हो जाएगा।'' पर 'साहित्य संदेश' और बाबू गुलाबराय ने मुझको नहीं छोड़ा। तो यहां से शुरूआत हुई, फिर बढ़ता ही चला गया, बढ़ता ही चला गया। वह यहां आए, मैं काशी गया, वे मेरे घर आए, मैं उनके घर गया। भाईचारा स्थापित होगया, पारिवारिक संबंध स्थापित होगए। उन्होंने मुझे लेखन में, व्यक्तिगत जीवन में, बहुत ही सहारा दिया, बड़ी प्रेरणा दी। हाथ पकड़कर के उठाया है उठाने वालों ने। हजारीप्रसाद द्विवेदी, बाबू गुलाबराय और विष्णु प्रभाकर- ये तीन व्यक्ति मेरे जीवन में आए हैं। डॉ. सत्येन्द्र के साथ आए हैं, जिन्होंने मुझे साहित्य में बहुत सहारा दिया।

प्रश्न : अभी आप नवीनजी के संबंध में बता रहे थे। आपने उन पर कविता भी लिखी है।
उत्तर : नवीनजी से मेरा साहित्यिक विषयों पर संबंध नहीं रहा। उनके व्यक्तित्व से मैं प्रभावित था, मेरे लेखक, पत्रकार होने से वे प्रभावित थे। खाते-पीते, उठते-बैठते, रोज़ मिलते थे। बातें किया करते थे। इस प्रकार से संपर्क बढ़ता ही चला गया। साहित्य के बारे में कम बात होती थी, बस देश और समाज के बारे में बातें होती रहती थीं। लालकिले का कवि-सम्मेलन 'नवीनजी' की प्रेरणा से प्रारंभ हुआ। उन्होंने जवाहरलालजी से कहा कि, "आप पहले चुनाव का शुभारंभ कवि-सम्मेलन से कीजिए।'' तो नेहरूजी ने कहा कि, "कवि-सम्मेलन में कितने आदमी आएंगे ? सौ कि पचास ?'' तो मैं भी वहां बैठा था। मैंने कहा कि, "आपको कितने आदमी चाहिए ?'' तो उन्होंने कहा कि, "कम से कम दो-चार हजार।'' मैंने कहा, "इससे ज्य़ादा आ जाएं तो।'' उन्होंने कहा, "तो फिर क्या कहना।'' उन्होंने मान लिया। मैंने शंकर कार्टूनिस्ट से दो बैलों की जोड़ी का निशान बनवाया। नवीनजी की अध्यक्षता में कवि-सम्मेलन कराया। देश के मूर्धन्य कवि आए, पांच लाख से ऊपर रामलीला मैदान में लोग इकट्ठे होगए। मिन्टो रोड की छतों पर, पेड़ों पर आदमी चढ़ गए। जवाहरलालजी खुश होगए और उन्होंने मुझे हिन्दी समिति का कार्यकर्त्ता बनने का सुझाव दिया, जिसके दिनकरजी बाद में कार्यकर्त्ता प्रमुख बने, परंतु मुझे गांधीजी ने कहा कि "तुम राजनीति के चक्कर में मत पड़ो। पत्रकारिता और साहित्य-सेवा करते रहो। साहित्य-सेवा भी देश-सेवा है। बाद में मुझे संसद के लिए टिकट मिला, मैं नहीं गया। इन्दिराजी भी मुझे राज्यसभा का सदस्य बनाकर रखना चाहती थीं, मैं नहीं गया। श्री लालबहादुर शास्त्रीजी मुझको 'पद्मभूषण' दिलाना चाहते थे, लेकिन मैंने 'पद्मभूषण' स्वयं न लेकर श्री माखनलाल चतुर्वेदीजी को दिलवा दिया। मैंने कहा कि मेरी उम्र तो अभी बहुत है, चतुर्वेदीजी को अभी तक नहीं मिला, आप उन्हें दे दीजिए। बाद में मुझे 'पद्मश्री' मिली जो मैंने हिन्दी की उपेक्षा पर वापिस लौटा दी।

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