गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

'पशु-काव्य' लिखने की बात कुछ यों शुरू हुईं। जब हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा और कहा कि हास्य ठीक-ठाक लिख रहे हो। हास्य को साहित्य में, संस्कृत साहित्य में, रीति साहित्य में मान्यता मिली है। लेकिन व्यंग्य को मान्यता नहीं मिली। इसलिए व्यासजी, तुम व्यंग्य लिखो। मेरे विचार से तुम अच्छा व्यंग्य लिख सकते हो और व्यंग्य में नए-नए प्रयोग करो। मनुष्य पर, नेताओं पर, समाज के लोगों पर सीधी बात न कहकर व्यंग्य के माध्यम से बात करो। जैसे पत्नी को माध्यम बनाकर मैंने अंग्रेजों पर कविताएं लिखीं। इसी प्रकार पशुओं को माध्यम बनाकर कविताएं लिखीं। एक कविता सुनाता हूं:-

आदमी की शेव बनती है,
रीछ की नहीं।
आदमी अंडरवियर पहनता है,
बन्दर नहीं।
हाथी पर अंकुश लगता है,
आदमी पर नहीं।
आदमी नेता हो सकता है,
लेकिन नेता आदमी नहीं।

ऐसी ही एक कविता और सुनिए ...........

इन्सानियत ले गए पशु
एक दिन ईश्वर के घर लूट हुई-
चूहा दांत ले भागा
बिल्ली मूंछें
खुदा स्टोर तलाश करने लगा
किससे पूछें ?
ऊंट ने उठाकर
उसे अपने पेट में फिट कर लिया था,
हाथी ने बुद्धि का बंडल
अपने कब्जे में कर लिया था,
घोड़े ने शक्ति
कुत्ते ने भक्ति
सियार ने संगीत
हिरनी ने अनुरक्ति
सूअर ने सृजन
बंदर ने तोड़-फोड़
शुतुरमुर्ग ने पलायन
लोमड़ी ने जोड़-तोड़
गाय ने श्रद्धा
भालू ने ताड़ी का अद्धा
गधे ने सहनशीलता
कुतिया ने अश्लीलता
शेर ने सम्मान
देसी पिल्ले ने अपमान
जब खजाना खाली होगया
पहुंचा इन्सान।
खुदा बोला ---
इन्सानियत तो रही नहीं
उसे तो जानवर ले गए ,
अब तो हमारे पास
हैवानियत, खुदगर्जी़
और बे-मौसम के काम-क्रोध ही रह गए हैं
चाहो तो ले जाओ !
मनुष्य बोला-लाओ, जल्दी लाओ!

प्रश्न : आपने जो कविता के अतिरिक्त बड़ा काम किया है। जिसको मैं बहुत सम्मान की दृष्टि से देखता हूं। आपका जो मैं बड़ा अनुकरणीय काम मानता हूं। देशप्रेम, साहित्यप्रेम और संस्कृतिप्रेम सबका प्रतिमान है वह ग्रंथ 'ब्रज विभव'। मैंने बहुत से लोगों से कहा कि ऐसा काम करना चाहिए। मैं भी 'अवध विभव' निकालना चाहता था। मेरी आकांक्षा थी जो पूरी नहीं हुई। आपने जो काम किया है, वैसा आज तक कोई और नहीं कर पाया। उसकी क्या पृष्ठभूमि थी। इसकी योजना आपने किस प्रकार से बनाई ?
उत्तर : आपने मेरा 'स्वतंत्रता के पच्चीस वर्ष', 'गांधी हिन्दी दर्शन' देखे हैं ? 'ब्रज विभव' का ऐसा है कि मैं जहां रहा, जिस प्रदेश में रहा, उसके प्रति मैंने अपने दायित्व को पूरा किया है। ब्रज में मैंने 'ब्रज साहित्य मंडल' बनाया। ब्रज की कहानियों का, ब्रज के लोकगीतों का, ब्रज की लोकोक्तियों का संग्रह किया। उस संग्रह से लोगों ने पी.एच.डी. तक की। उसकी रिपोर्ट आज भी नागरी प्रचारणी सभा में जमा है। दिल्ली आया तो दिल्ली को उठाया। चालीस हजार लोग तैयार किए। मेरे मन में ब्रज का साहित्य, ब्रज की संस्कृति, ब्रज की धरोहर जमी हुई थी, उसको बाहर निकालने के लिए मैं तड़प रहा था। उसके लिए बनारसीदासजी की प्रेरणा मिली और जगदीशप्रसाद चतुर्वेदी, भवानीप्रसाद मिश्र आदि ने कहा कि ब्रज पर लिखो। मैंने ब्रज पर लिखना शुरू किया और मथुरा के एक जोशी बाबा ने मुझे बड़ा प्रोत्साहन दिया और कहा कि ये सामग्री यहां से मिल सकती है। इनसे पत्र-व्यवहार करो। तो वहां से नंदगांव, बरसाने के बारे में, वृंदावन के बारे में पूछ-पूछकर और जो जानकारियां मेरे मन में थीं सब निकालकर यह ग्रंथ 'ब्रज विभव' तैयार कर दिया। बाद में हमारे पं. कमलापति त्रिपाठीजी की कृपा से इसके छपने का भी प्रबंध होगया। त्रिपाठीजी ने दस धनीमानी लोगों से दस-दस हजार रुपये इकट्ठे करके इस ग्रंथ को छपवा दिया।

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