गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

प्रश्न : आपका विवाह कब हुआ ? क्या पिताजी ने किया ?
उत्तर : ब्याह तो मेरा सोलह साल की उम्र में पिताजी ने कर दिया। माँ तो मर गई थी, वह मेरी सगाई ही देख पाई। अपनी बहू देखने के लिए वह तड़पती चली गई। अपनी माँ की मैं कोई सेवा नहीं कर सका। ये दुख मुझे हमेशा सालता रहता है। मैंने यश भी खूब कमाया, धन भी खूब कमाया, लेकिन अपनी जननी माँ को जो जन्मभर दुखिया रही, उसकी मैं कोई सेवा नहीं कर सका।
प्रश्न : व्यासजी, मैंने विवाह का प्रश्न आपसे जानबूझकर पूछा। आपने हास्य-रस में विशेष तौर पर पत्नीवाद का प्रयोग किया है। इसके संबंध में कुछ बताइए ?
उत्तर : यह वह समय था जब अंग्रेजों का राज पूरी तरह से जमा हुआ था। कोई कुछ नहीं कह सकता था, दमन चक्र चल रहा था। जो कोई कुछ बोलता उसे पकड़कर जेल भेज दिया जाता था। ऐसी विषम परिस्थितियों में मैंने अपनी पत्नी को माध्यम बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ़ कविता लिखना शुरू किया। मेरी हर कविता में समय की छाप हैः
उनको अपनी हिटलर समझो,
चर्चिल सा डिक्टेटर जानो,
पत्नी को परमेश्वर मानो।
डिफेंस एक्ट के ज़माने में मैंने पत्नी को माध्यम बनाकर कविताएं लिखी। इटावा में ये कविताएं मैंने शिवनारायण अग्रवाल के चाचा को सुनाईं जो वहां रहते थे। उन्होंने मुझे पहचान लिया, 'हिन्दुस्तान' के मैग्ज़ीन सेक्शन का एक संपादक वहां रहता था। उन्होंने उसका उल्लेख पत्रकार महोदय से किया। वह मेरी कविताएं ले गया और वह कविताएं 'हिन्दुस्तान' में छपने लगीं। फिर देवदास गांधी का पत्र आया कि आप प्रति सप्ताह कविता भेजते रहिए। पाठकों को और हमें यह कविताएं बहुत पसंद आईं। तब मैं और अधिक लिखने लगा। मैं जब हरिद्वार आया था तो उस हिन्दी सम्मेलन में जैनेन्द्रजी भी आए थे। जैनेन्द्रजी ने मुझसे कहा कि "तुम दिल्ली आ जाओ'' तो मैंने कहा, "कौन जाए यार अब, मथुरा की गलियां छोड़कर।'' कुछ दिन बाद एक सादे लिफाफे में पचास रुपये और एक चिट जिस पर लिखा था, "व्यास, दिल्ली आ जाओ।'' जैनेन्द्रजी का पत्र था। फिर लोगों ने मुझे परामर्श दिया कि चूको मत, चले जाओ। और मैं दिल्ली आ गया। जैनेन्द्रजी के पास बहुत दिन रहा। जैनेन्द्रजी से बिगड़ गई। 'हिन्दुस्तान' में कविताएं छपती रहीं। हिन्दुस्तान से दीवाली पर दो सौ रुपये का बोनस मिला। मैं फूला नहीं समाया। कविताओं पर पहली बार किसी अख़बार से बोनस मिला। कुछ दिन उपरांत देवदास गांधी (महात्मा गांधीजी के पुत्र) का पत्र आया कि आप मुझसे मिल लीजिए। मैं मिलने गया तो देवदासजी ने कहा कि आप 'हिन्दुस्तान' में आ जाइए। देवदास गांधीजी उस समय 'हिन्दुस्तान टाइम्स' में निदेशक थे। मैं 'हिन्दुस्तान' में काम करने लगा।
प्रश्न : व्यासजी, ये बताइए, आपने अपनी 'पत्नी' पर इतनी कविताएं लिखीं और वे बहुत प्रसिद्ध हुईं। भाभीजी उन कविताओं को सुनती थीं, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया हुई।
उत्तर : ऐसा है कि विजयलक्ष्मी पंडित और पं. जवाहरलाल नेहरू मेरी कविताओं के बड़े प्रेमी थे। तो एक दिन विजयलक्ष्मी पूछतीं-पूछतीं मेरे घर आ गईं और मेरी पत्नी से कहने लगीं कि, "तुम्हारे बारे में व्यासजी कविता लिखते हैं, क्या तुम पढ़ती हो ? क्या अंट-शंट लिखते रहते हैं।'' मेरी पत्नी पढ़ी-लिखी तो हैं नहीं, उन्होंने कहा कि, "कोई कुछ धंधा करता है, तो कोई कुछ। ये कविता करके मेरे नाम से कमा रहे हैं, तो कमा लेने दो। मैं तो इन्हें इसी रूप में जानती हूं, आगे कुछ नहीं।''
प्रश्न : हास्य रस की कविताओं की बात हुई। आपकी कुछ कविताएं एक बार मैंने सुनी थीं तो आपने पशुओं पर भी कुछ कविताएं लिखी हैं। 'पशु-काव्य' लिखा है। नाम तो उनका पशुओं पर था, पर यह कविताएं पशुओं के माध्यम से मनुष्यों पर हैं। वह कविताएं बड़ी पसंद की गईं। हास्य में सामाजिक चेतना कैसे समाहित की है, आपकी इन कविताओं से पता चलता है।
उत्तर : मैंने साहित्य में आप जैसे साहित्यकारों की प्रेरणा से बहुत प्रयोग किए हैं, कविता के क्षेत्र में भी और लेखन के क्षेत्र में भी। पत्नी पर ही नहीं, पूरा 'परिवार रस' लिखा है। ब्रजभाषा में 'गोपिन के अधरान की भाषा' और 'रास-रसामृत' में भगवान का रास कैसा हुआ, उस रास का रहस्य क्या है ? यह रासलीला नहीं, बल्कि गोपियों का प्रेमभाव है। संयोग नहीं, वियोग है। जब नेताजी ने 'दिल्ली चलो' का अभियान शुरू किया और सेना बनाकर हिन्दुस्तान की ओर चल दिए तो शायद आपको याद हो मैं हिन्दुस्तान में प्रतिदिन 'नेताजी' पर एक कविता लिखता था। उन कविताओं को दिनकरजी ने 'वीर रस का खंडकाव्य' कहा है। उसमें मैंने मातृभूमि के प्रति नेताजी का प्रेम व्यक्त किया है।

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