गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

प्रश्न : व्यासजी आपका जो जीवन संघर्ष है, जो आपका व्यक्तित्व रहा है, वह अपने समय के अनेक आयामों को छूता रहा है। कितने साहित्यकारों से मित्रता रही है, परिचय रहा है। वह तो बड़ा ओजस्वी युग था। स्वतंत्रता आंदोलन का युग था, उस समय में भी आपने हास्य रस को अपना विशेष विषय बनाया। इसका क्या कारण रहा ?
उत्तर : हम बाबू गुलाबराय आदि के साथ एक गोष्ठी चलाते थे। उस गोष्ठी का चंदा कुछ नहीं था, ये था कि रचना पढ़नी है। सब अपनी-अपनी रचना पढ़ते, यानी रचनाकार ही उसके सदस्य थे। तो मेरा नम्बर आया तो सोचने लगा मैं क्या सुनाऊं ? बाबू गुलाबराय की लड़के को शादी में एक भैंस मिली थी। वह भैंस दूध ही नहीं देती थी, बाबूजी को छाछ, मक्खन ही नहीं देती थी, बल्कि बाबूजी के बगीचे के फल-फूलों को खा जाती थी, बिगाड़ देती थी। और एक दिन तो वह गुसलखाने में घुस गई। गुसलखाने में उनकी पत्नी नहा रही थी। तो बाबूजी भागे-भागे आए 'साहित्य संदेश' में और कहने लगे भैंस गुसलखाने में घुस गई है और उसमें पत्नी बैठी हुई है, व्यासजी उसे निकलवाओ। तो मैं और दो-तीन आदमी रस्सा लेकर गए। रस्सा बांधकर उस भैंस को निकाला तो उनकी पत्नी मुक्त होगईं। मैंने उस भैंस पर एक कविता पहले लिखी थीः

ओ, बाबूजी की डबल भैंस!
मेरी कुटिया में घुस आई
तू बाबूजी की डबल भैंस!
ओ, बाबूजी की डबल भैंस!

ओ काली-सी, मतवाली-सी,
क्यों बिना सूचना घुस आई ?
समझा होगा शायद तूने
इसको कालिज का खुला 'मैस'
ओ, बाबूजी की ...................।

ऐ भैंस! अभी तक मैं तुझको
अक्कल से बड़ी समझता था।
ऐ महिषी! अब तक मैं तुझको,
अपरूप सुंदरी कहता था।

तेरी जलक्रीड़ा मुझे बहुत ही
सुंदर लगती थी, रानी!
तेरे स्वर का अनुकरण नहीं
कर सकता था कोई प्राणी

पर आज मुझे मालूम हुआ
तू निरी भैंस है, मोटी है,
काली है, फूहड़ है, थुल-थुल,
मरखनी, रैंकनी, खोटी है।

मेरे ही घर में आज चली
तू पाकिस्तान बनाने को ?
मेरी ही हिन्दी में बैठी
तू जनपद नया बसाने को ?
मैं कहता हूं, हट जा, हट जा,
वरना मुझको आ रहा तैश
ओ बाबूजी की .......

ऐसी पहली कविता मैंने लिखी। फिर 'नागरी प्रचारिणी सभा' में साहित्यकार संसद होती थी। उसमें कविता-पाठ होते थे। उसमें एक हरिशंकर शर्मा भी थे। उन्होंने मेरी कविताएं सुनीं। शर्माजी आदि ने बहुत पसंद कीं। मेरा उत्साह बढ़ा। मैंने दो-तीन कविताएं और लिखीं। 'वीणा' के संपादक कालकाप्रसादजी 'कुसुमाकर' आगरा आए। उन्होंने मेरी कविताएं सुनीं। मैंने चार कविताएं ही तब तक लिखी थीं। 'कुसुमाकर' जी मेरी चारों कविताओं को ले गए और उनको लगातार 'वीणा' में छापा। उन्होंने मेरे विषय में लिखा "यह तो नया हास्य-व्यंग्य का आदमी पैदा हुआ है, नई ज़मीन तोड़ी है, बेढब से, बेधड़क से बिलकुल अलग है।''

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