गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

'प्रिय-प्रवास' आया, मैं सभी पढ़ता गया। साहित्य की पुस्तकें और साहित्यकारों से संपर्क यही मेरी कमाई है, यही मेरे संस्कार हैं, यही मेरी शिक्षा है। कइ‌यों की शिक्षा पूरी नहीं हुई। न रवीन्द्रनाथजी की हुई न देवदास गांधी की, न मेरे संपादक मुकुटबिहारी की हुई। लेकिन ये सब अपने समय के बहुत बड़े साहित्यकार व पत्रकार हुए। इसका मुझे बड़ा अफसोस रहा कि मैं मैट्रिक नहीं कर सका। मैं अंग्रेजी नहीं जानता था, तो बनारसीदास चतुर्वेदीजी ने मुझसे कहा कि व्यासजी, आप किसी एंग्लो इंडियन लड़की से प्रेम करो तो आपको अंग्रेजी आ जाएगी। मैंने कहा- मैं क्या प्रेम करूंगा। लेकिन आगरे में एक वैश्य हाउस (छात्रावास) है, उसमें मेरे मित्र पढ़ते थे बचपन के- भारतभूषण अग्रवाल, विद्याभूषण अग्रवाल आदि। रांगेय राघव से भी मेरी परम मित्रता थी। ये सब अंग्रेजी में बोलते थे। इनसे अंग्रेजी सुन-सुनके मैं भी अंग्रेजी जान गया और इतनी जान गया कि जब 'हिन्दुस्तान' में आया तो अंग्रेजी समाचारों का अनुवाद भी करने लगा। इसलिए मेरी मान्यता ये है कि जिसे अपनी भाषा अच्छी तरह से आती है, वह दूसरी भाषा भी आसानी से जान जाता है, सीख सकता है।

प्रश्न : व्यासजी कोई अपनी ब्रजभाषा की कविता सुनाने की कृपा कीजिए।
उत्तर : तो सुनिए, ब्रजभाषा का एक स्वरचित छंदः

सूर कही, तुलसी नै लही,
प्रभु पांयन सों परसी ब्रजभाषा।
'देव', 'बिहारी' करी उर धारन,
मोतिन की लर सी ब्रजभाषा।
'भूषण' पाय 'भवानीं' भई,
कवि 'व्यास' हियै हरसी ब्रजभाषा।
'मतिराम' के मानस में सरसी,
धन आनंद ह्‌वै बरसी ब्रजभाषा।


प्रश्न : व्यासजी आप दिल्ली कब और कैसे आए ?
उत्तर : दिल्ली, ऐसा है हरिद्वार में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ। इसमें माखनलालजी चतुर्वेदी को चांदी के रुपयों से तोला गया। मैं उन दिनों सन्‌ 1942 के आंदोलन में तोड़-फोड़ करता हुआ भटकता-भटकता इटावा पहुंच गया था। इटावा में श्रीनारायण चतुर्वेदी के पिता श्री द्वारिकानाथ चतुर्वेदी रहते थे। वह ब्रजभाषा का शब्दकोश बना रहे थे। उन्होंने मुझे आया जानकर अपने पास रख लिया और मैंने 'ब्रजभाषा शब्दकोश' तैयार करने में उनकी काफी सहायता की। वह 'शब्दकोश' छप भी गया। मैंने श्रीनारायणजी चतुर्वेदी से कहा कि वह कोश मुझे भिजवा दो, मगर वह नहीं भिजवा सके। जहां भी गया, ब्रज में गया तो 'ब्रज साहित्य मंडल' बनाया और ब्रजभाषा की सेवा की। दिल्ली में आया तो 'दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन' बनाया और इलाहाबाद में गया, आपने सुना है नाम 'परिमल'। मेरा वहां भी आना-जाना होता था। इलाहाबाद में मैं रात में हमेशा महादेवीजी के पास घंटे-आधा घंटे अवश्य बैठता था और निरालाजी से तो मेरी लखनऊ से ही जानकारी थी। पंतजी तो मुझसे ऐसे प्रभावित थे उन्होंने मेरे बारे में ये कहा है कि, "दूध में पानी मिल सकता है मगर व्यासजी में जो शुद्ध हास्य है, वह किसी और के पास नहीं। वह मिलावट रहित है।''

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