गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

जिसका नाम चंद्र सरोवर है, इसके संबंध में एक पौराणिक व्याख्या यह है कि भगवान के रास के समय में चन्द्रमा ने अपना अमृत उस सरोवर में निचोड़ा था, इसलिए इसका नाम 'चंद्र सरोवर' होगया। उस सरोवर के उस पार तो सूरदासजी ने ललित लीला के पद गाए थे और इस पार मेरा जन्म हुआ था। हमारा सूरदासजी से गांव का नाता है। हमारे गांव के लोगों का कृष्णभक्ति, रासलीला के पदों से गहरा नाता था। सूरदासजी के अलभ्य पदों को सभी लोग सुनाया करते थे। हमारे पिताजी तो सूरदासजी के भजनों का कीर्तन करते हुए उठते थे और सेवा करते समय वे मंगला के, श्रृंगार के, भोग के, आरती के पदों को तानपूरे पर गाया करते थे। उस सूरकुटी का प्रभु ने ऐसा सहयोग दिया कि मैंने उसका जीर्णोद्धार कराया और जिस चबूतरे पर सूरदासजी बैठा करते थे और उनके पीछे उनका एक भक्त टीप्पणी (डायरी) लेकर बैठ जाता था। सूरदासजी गाते थे और वह लिखता जाता था। उससे ही 'सूर सागर' बाद में प्रकाश में आया तो मैंने भी देखा-देखी बाद में 'हास्य सागर' नाम से एक ग्रंथ लिखा। सूरदासजी का 'सूर सागर' और मेरा 'हास्य सागर'।

सूरदासजी और अष्टछाप के कवियों का साहित्य, उनकी वार्ताएं हमारी परंपरा में थीं। हमारे पिताजी के संग्रह में थीं। ये जो पदावली है अष्टसखाओं की उसका भी मैंने अध्ययन किया है। उससे मेरे साहित्य-संस्कार बने। फिर मथुरा का वातावरण। हम गांव से मथुरा आ गए। पिताजी ले आए। वहां कविता का वातावरण था। ऐसा कोई व्यक्ति न था जिसे दस-बीस-पचास ब्रजभाषा के छंद याद न हों। वहां समय-समय पर कवि-गोष्ठियां होती थीं। वहां पढ़ंत हुआ करती थी। पढ़ंत में कविता पढ़ी जाती थी। कोई एक विषय दे देते थे उसी पर सब सुनाते थे। उसमें नवरस, नायिका भेद आदि के, यमुना के, गंगा के, कृष्ण के, शिवजी के छंद पढ़े जाते थे। मैं भी उसमें भाग लिया करता था। मुझे भी ब्रजभाषा के छंद याद होगए। उन छंदो के याद होने से मैं भी ब्रजभाषा में कविता करने लगा।

प्रश्न : व्यासजी आपकी पढ़ाई कहां तक हुई ?
उत्तर : पढ़ाई का ये हाल है कि मैं पढ़ा ज़रूर दर्जा सात तक, लेकिन हर बार प्रमोशन से पास हुआ। क्योंकि मेरा ध्यान गणित में, अंग्रेजी में, भूगोल में, फालतू चीजों में नहीं लगा। मैं तो कविता करता था और यमुनाजी के तट पर बैठकर लहरों को गिना करता था। पानी में चादर पड़ती है, भंवर पड़ते हैं, उनको देखा करता था। मछलियां कैसे जल के बहाव के ऊपर बहती हैं, देखा करता था। नावें कैसे चलती हैं और नाविक कैसे चलाते समय गाते हैं, उनके गीतों को सुना करता था। ये सब मेरे संस्कार बने यमुना से, मथुरा से। उसके बाद आगरा आया तो आगरा में नागरी प्रचारिणी सभा, साहित्य संदेश, बाबू गुलाबराय, रामविलासजी, हरिशंकर शर्मा, अमृतलाल चतुर्वेदी सबसे मेरा संपर्क हुआ। और साहित्य रत्न भंडार में जो उस समय साहित्य की पुस्तकों का एक मात्र केन्द्र था, मैंने उसमें जो नई-नई पुस्तकें आतीं उनका अध्ययन करता। मैं किराये के मकान में नहीं रहा। 'साहित्य संदेश' का संपादन करता था, वहीं रद्दी का तकिया बनाकर उसकी टांड पर सो जाता था। जो नई से नई साहित्य की पुस्तकें आतीं उन्हें पढ़ता। तभी मेरे सामने 'पंतजी' का 'पल्लव' आया। निरालाजी का 'कुल्लीभाट' ओर श्यामनारायण पाण्डे का 'हल्दीघाटी' आया।

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