गोपालप्रसाद व्यास से साक्षात्कार

(श्री विश्वनाथ त्रिपाठी )

       
हिन्दी की संस्कृति के प्रतीक व्यासजी

       

परम श्रद्धेय, हिन्दी के अनन्य सेवक और हमारे सम्माननीय पं. गोपालप्रसाद व्यासजी के व्यक्तित्व के प्रति मेरे मन में जो सम्मान है, वह अनेक कारणों से है। सबसे पहले तो मैं, यह निवेदन करूं कि मेरे गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी व्यासजी से बहुत स्नेह रखते थे और व्यासजी से उनका बहुत अंतरंग संबंध था। व्यासजी जब 50 वर्ष के हुए तो उनके सम्मान में एक अभिनंदन ग्रंथ निकला था। कोई समारोह हुआ था दिल्ली में। मैं व्यासजी को जानता तो था, लेकिन उनकी गरिमा से उस समय बहुत अधिक परिचित नहीं था। मैंने द्विवेदीजी से पूछा कि "आप यहां व्यासजी के सम्मान में इतनी दूर से क्यों आए हैं ?'' तो उन्होंने मुझे बहुत देर तक समझाया और कहा कि "तुम व्यासजी कि विद्वता से, उनके व्यक्तित्व से, उनकी हिन्दीसेवा से भली-भांति परिचित नहीं हो। वह बहुत कर्मठ आदमी हैं, बहुत उद्योगी आदमी हैं। वह सिर्फ हास्यरस के कोई सामान्य कवि ही नहीं हैं, बल्कि उनका व्यक्तित्व बहुमुखी है।'' दूसरे जिस साहित्यकार का मैं बहुत सम्मान करता हूं उनका नाम है डॉ. रामविलास शर्मा। उनको जब साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तो उसमें व्यासजी भी गए थे और उनके जाने का उल्लेख डॉ. रामविलास ने मुझसे बाद में किया था। फिर अनेक ऐसे प्रसंग आए जब मुझे इस बात का प्रमाण मिला कि व्यासजी कोई साधारण हिन्दीसेवी नहीं हैं और कुछ मेरा सौभाग्य रहा है कि उनकी मेरे ऊपर कृपा भी लगातार बनी रही। सामान्यतः लोग उनको हास्यरस के कवि के रूप में जानते हैं। शायद इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि व्यासजी ने अपने चारों ओर प्रभामंडल बनाने का कोई प्रयास नहीं किया। वह बहुत समर्थ गद्यकार हैं। लगभग पचास वर्षों से अधिक उनका एक बहुत मशहूर स्तंभ 'नारदजी खबर लाए हैं' दैनिक 'हिन्दुस्तान' में छपता है। मैं समझता हूं कि लगभग पचास वर्षों से लगातार कोई कालम शायद ही किसी भाषा के साहित्य में कहीं चला हो। फिर उन्होंने 'यत्र-तत्र-सर्वत्र' का स्तंभ भी प्रतिदिन लिखा था। राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से वर्षों तक ऐसा स्तंभ लिखना कोई साधारण बात नहीं है। जो हिन्दी की संस्कृति है, उसके प्रतिनिधि, उसके प्रतीक हैं वे। उन्होंने 'ब्रज विभव' नाम से एक दुर्लभ ग्रंथ का संपादन किया है। वह ऐसा अनुकरणीय व आदर्श ग्रंथ है कि हिन्दी की जितनी बोलियां हैं, उन सभी बोलियों के जो प्रेमी हैं, उनको ऐसे ही ग्रंथ निकालने चाहिए। उनके लिए एक आदर्श का काम करेंगे। जैसे 'ब्रज विभव' निकला है, वैसे ही 'अवध विभव', 'छत्तीसगढ़ी विभव' तथा 'भोजपुरी विभव' निकलने चाहिए। यह बड़ा ही महत्वपूर्ण काम किया है व्यासजी ने। ऐसे व्यक्ति का अनुभव बड़ा लम्बा है। बड़ा दीर्घ अनुभव है। वह वयोवृद्ध हैं। लोग वयोवृद्ध होते हैं, व्यासजी भी वयोवृद्ध हैं तो हमने यह उचित समझा कि ऐसे अवसर पर उनसे मिलकर जो हो सके, उनसे जानकारी हासिल करके हम भी लाभान्वित हों। मेरे प्रणाम करते ही व्यासजी प्रमुदित होकर बैठ गए। मैनें व्यासजी से उनके साहित्य-संस्कार के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा-

बंधुवर त्रिपाठीजी, पहले तो आप कृपा करके स्वयं हमारी कुटिया में पधारे, आपका हृदय से सपरिवार स्वागत करता हूं। ये मेरा अहोभाग्य है कि आप जैसा साहित्य मनीषी हमारे घर आए और हमारे बारे में कुछ जाने, कुछ कहे, कुछ बताए यह हमारा परम सौभाग्य है। जहां तक मेरे साहित्य-संस्कार की बात है, जैसे मैंने बताया कि मेरा जन्म हुआ ब्रज चौरासी कोस के देवता गिरिराज महाराज की तलहटी में, वल्लभाचार्य ने जिसको 'आदिवृंदावन' कहा है, जहां परम रासस्थली बनी है, जहां पर महारास हुआ, जहां इन्द्र ने नगाड़े बजाए, वे पत्थर की शिलाएं भी वहां रखी हैं, जो बजाने से नगाड़ों की तरह बजने लगती हैं।

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