हिन्दी की होली तो हो ली

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

(इस लेख का मज़मून मैंने होली के ऊपर इसलिए चुना कि 'होली' हिन्दी का नहीं, अंग्रेजी का शब्द है। लेकिन खेद है कि हिंदुस्तानियों ने इसकी पवित्रता को नष्ट करके एकदम गलीज़ कर दिया है। हिन्दी की होली तो हो ली, अब तो समूचे भारत में अंग्रेजी की होली ही हरेक चौराहे पर लहक रही है।)

भारत यानी 'इंडिया' ने आज़ादी 'फ्रीडम' हासिल करने के बाद बेहद तरक्की यानी 'प्रोग्रेस' की है। सुई से लेकर हवाई जहाज तक बनाने की बात में कोई खास वज़न नहीं। सुई का फावड़ा तो हिंदुस्तानी पहले भी कर दिया करते थे। अब देख-देखकर हवाई जहाज बनाने लगे, तो कौन सा तीर मार लिया ! प्रोग्रेस के असली मुद्दे तो कुछ दूसरे हैं। उदाहरण के लिए, नहीं-नहीं फॉर एग्ज़ाम्पल, सन्‌ 47 के बाद इतना बदलाव आया, आई मीन चेंज हुआ कि हिंदुस्तानी, हिंदुस्तानी नहीं रह गया। वह बहुत जल्द अपनी असलियत को पहचान गया। अब पंजाबी है, हरियाणवी है, ब्रजवासी है, बुंदेलखंडी है, भोजपुरी है, बिहारी है, मैथिली है, छत्तीसगढ़ी है, उड़िया है, बंगाली है, असमी है, मलयाली है, कन्नड़ी है, द्रविड़ है, केवल मराठी नहीं, देशस्थ है, कोंकणस्थ है, गुजराती है, महाराष्ट्री की जुबान में सौराष्ट्री है, सिंधी है, कश्मीरी है। कितनी खुशी होती है हिंदुस्तान के इस नए 'गार्डन' में खिले हुए नए-नए फूलों को देखकर। आई मीन-हिन्दी वाले फूल, अंग्रेजी वाले 'फूल' नहीं।
यह तो हिंदुस्तान की विशेषता है (क्या कहते हैं अंग्रेजी में विशेषता को ? जो भी कहते हों) कि यहां हर आदमी की, हर इलाके की, हर सूबे की अलग-अलग पहचान है। कोई ब्राह्‌मण है, कोई वैश्य, कोई क्षत्रिय है, कोई हरिजन तो कोई गिरिजन। कोई सूचित है, कोई अनुसूचित, कोई आदिवासी है, कोई वनवासी, कोई सिक्ख है, तो कोई जैन, कोई पारसी है, कोई मुसलमान है और कोई अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का रिप्रेजेंटेटिव यानी क्रिश्चियन। आज़ादी के बाद इन सबको अपनी-अपनी जाति, प्रदेश, भाषा और संस्कृति को विकसित करने का अचूक अवसर दिया है भारत की होनहार लोकप्रिय सरकारों ने। इतिहास में इनकी देन को 'गोल्डन लैटर्स' यानी स्वर्ण-अक्षरों में लिखा जाएगा। आगे आने वाली पीढ़ियां यों गर्व से सीना फुलाकर यह कहेंगी कि जो काम सम्राट अशोक, हर्ष, चंद्रगुप्त, अकबर, विक्टोरिया और जार्ज नहीं कर सके, वह स्वतंत्र भारत की सरकारों ने केवल 50 वर्षों में करके दिखा दिया। और आप जानते हैं कि इतना बड़ा काम इतने छोटे समय में इतनी आसानी से कैसे होगया। इसका श्रेय यानी 'क्रेडिट' हमारे इंटरनेशनल बनने की सच्ची लगन को है। इसके लिए हमने आमूल-चूल, ओह नो, टाप टू दी बौटम परिवर्तन, आई मीन चेंज करने का बीड़ा उठा लिया। कितनी कड़ी मेहनत करनी पड़ी है, हमारे नेताओं को इसके लिए। अब यही लीजिए कि भारतीयों के अब शादी-विवाह नहीं होते, मैरिज होती है। औरतें गर्भवती नहीं, 'प्रैगनैंट' होती है। उनका जापा नहीं, 'डिलीवरी' होती है। घर में शिशु जन्म नहीं लेता, बाबा या बेबी पैदा होते हैं। बच्चे के पैदा होते ही मां मम्मी हो जाती है और पिता डैडी। बच्चे पाठशाला में नहीं जाते, पेड़-पौधों की तरह नर्सरियों में सींचे-सहेजे जाते हैं। फिर स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी-जहां वे आर्ट्‌स पढ़ते


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