हे हिन्दी के आलोचको !

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

मैं हास-परिहास की कविताएं अच्छी लिखने लगा हूं। अच्छी ही नहीं, बहुत अच्छी लिखने लगा हूं। इसके प्रमाण में मैं आपको संपादकों के पत्र, कवि सम्मेलनों के निमंत्रण और छपी हुई रचनाओं की छोटे-बड़े अखबारों की वे सब 'कटिंग' जो मैंने सम्हालकर एक रजिस्टर में चिपका रखी हैं, जब चाहें तब दिखा सकता हूं। मेरी सफलता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि कविता सुनने से पहले ही लोग मेरी सूरत पर हंसते हैं। सुनने के बाद ताली पीटते हैं और बाहर निकलने पर उंगली उठाते हैं कि ये चले, वे चले।
इसलिए जब हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल के असामयिक निधन पर दृष्टि डालता हूं तो कभी-कभी मुझे बड़ी निराशा होती है।
हाय ! अब शुक्लजी के बिना कौन मेरे महत्त्व को हिन्दी साहित्य में स्थापित कर सकेगा ?
तब ऐ हिन्दी साहित्य के नवीन इतिहास-लेखको ! विधाता की इस भूल को, जो उसने असमय ही शुक्लजी को अपने पास बुलाकर की है, अपने इस उत्तरदायित्व को, जो अनायास आपकी कलम पर आ पड़ा है, क्या तुम निबाह सकने में समर्थ हो सकोगे ?
बुद्धिमानी इसी में है कि तुम इस अवसर से लाभ उठाओ। तुम्हारी लेखनी मेरे विषय में लिखते हुए धन्य हो उठे। तुम लिखो-"व्यास जैसे अमर व्यक्तित्व साहित्य के इतिहास में कभी-कभी ही उदित होते हैं। हिन्दी के इतिहास में इने-गिने दो-चार ही व्यक्ति हैं, जिनका नाम श्रद्धेय व्यासजी के साथ लिया जा सकता है। इस छोटी उम्र से ही उनकी कलम ने जो जौहर दिखाए हैं, ऐसे उदाहरण तो हमें हिन्दी साहित्य में देखने को नहीं मिले।''
कोई भले कहे कि शुक्लजी नवीन लेखकों के यशगान में बड़े कृपण थे, पर आज कहीं वह होते और मुझे देख पाते तो विश्वास मानिए कि वह मेरे अंतर को खोलकर रख देते और लिखते- "व्यासजी की कविताओं में हमें शिष्ट हास्य की सुंदर झांकी मिलती है। उन्होंने अपरूप वस्तुओं में से हास्य की उदभावना न कर, जीवन की हास्योन्मुखी वृत्ति का उदघाटन किया है। क्रिया के अभिव्यंजनावाद में छायावाद (इंप्रेशनिज्म) का पुट देकर सामयिक लहरियों से उच्छलित व्यासजी की हास्य-सृष्टि अपूर्व हो उठी है।'' पर हाय ! वह रत्नपारखी न रहा। तब हे नए युग के उदार समालोचको ! तुम अब यह लिखो-
"व्यासजी ने हिन्दी के सारे परिहास-लेखकों को सौ कदम क्या हजार मील पीछे छोड़ दिया है। उर्दू के अकबर होते तो दांतों तले उंगली दबा जाते। 'हास्यरस' के चुटकुले कहना और बात है। उक्तियों में स्वयं वैदग्ध्य होता है, पर हास्य को विषय और वस्तुओं में बांधना टेढ़ा काम है। व्यासजी ने इस महत्त्वपूर्ण कार्य को अपने हाथ में लेकर हिन्दी का मस्तक ऊंचा उठाया है। वह सूर की तरह सरस, तुलसी की तरह व्यापक और बिहारी की तरह सदैव प्रिय रहेंगे।'' और ऐ मेरे आलोचक दोस्तो ! तुम्हारी मित्रता यदि आज के दिन काम न आई तो फिर कब आएगी ? अपनी पुस्तक की पहली प्रति मैं आपके पास भेज रहा हूं। तुम हिन्दी के पत्रों में वह तूफान बरपा दो कि कहर मच जाए। मेरी कविता में जो गुण नहीं हैं, उन्हें खोज निकालो। चाहता हूं कि


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