खुशामद भी एक कला है

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

मज़ाक नहीं, खुशामद भी एक कला है। और कमबख्त़ ऐसी कला है कि सारी दुनिया इसमें माहिर होना चाहती है, लेकिन बदकिस्मती भी ऐसी है कि नाचने-गाने और भगवान जाने झूठ या सच, किसी-किसी सभ्य देश में तो चोरी सिखाने तक के स्कूल-कॉलेज खुल गए हैं, पर खुशामद जैसी खुशनुमा और दिन-रात व्यवहार में आने वाली उपयोगी 'आर्ट' पर न तो कोई डिग्री कॉलेज है और न किसी यूनिवर्सिटी में इस विषय पर 'थीसिस' ही स्वीकार की जाती है। नतीजा यह है कि योगियों के लिए भी परम दुर्लभ इस गहन तत्त्व का विधिवत अध्ययन नहीं हो पाया और इस विद्या का जैसा शास्त्रोक्त और सुसंस्कृत प्रचार होना चाहिए, वैसा नहीं हो रहा। अभी तो हाल यह है कि आदमी की अक्ल ने अपने-अपने अलग छुरी-कांटे बना रखे हैं कि सेंक-सेंककर टोस्ट पर मक्खन लगाया जा रहा है। अपने-अपने जाल और कांटे हैं कि परिंदे फंस रहे हैं, मछलियां अटक रही हैं, अपना-अपना मांजा और करिश्मा है कि पतंग बढ़ाई जा रही है और पेच-पर-पेच उलझा दिए गए हैं और इस तरह अपनी-अपनी किश्तियां हैं कि धार में छोड़ दी गई हैं कि किनारे लग जाएं तो राम मालिक और डूब जाएं तो मर्जी भगवान की !
भाई मेरे, पिताजी की फालतू कमाई पर गोते खा-खाकर बी.ए., एम. ए. हो जाना और बात है और जीवन में बिना कौड़ी-पैसे के सफलता प्राप्त करना अलग बात है। आपने चाहे छब्बीस वर्ष तक बलात्‌ ब्रह्‌मचर्य पालन करके जैसे-तैसे विद्यालंकारिता भले ही हासिल कर ली हो, लेकिन जब तक खुशामद का 'कोर्स' लेकर आपको 'तिकड़म' की सनद नहीं मिलती, तब तक किसी दफ्तर की अफसरी तो क्या, आपको जनाब, कहीं चपरासीगीरी भी नहीं मिल सकती। जी हां, चपरासीगीरी ! विश्वास न हो तो अपने शहर में जो म्युनिसिपल कमेटी है, उसके सक्के से लेकर सेक्रेटरी तक से एकांत में पूछ लीजिए कि हुजूर, जो कुछ आज आप दिखाई देते हैं, वह सब किसकी बदौलत हैं। हर ईमानदार आदमी आपसे यही कहेगा, अजी हम किस काबिल हैं, यह तो महामहिमामयी, परम भगवती, खुशामदी देवी का ही परम प्रसाद है।
यही क्यों, आप किसी भी दफ्तर के मैनेजर क्या, हैडक्लर्क तक के हाथ पर गंगाजली रखकर ईमान से पूछ लीजिए कि महाराज, हम किसी से भी जिंक्र नहीं करेंगे, न अखबारों में छपने देंगे, पर कृपा कर यह तो बताइए कि जिस कुर्सी पर आज हमें बैठना चाहिए था, वहीं आप कैसे विराजमान हैं ? वह क्या उत्तर देंगे यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन इतना अवश्य बता दूं कि जितने भी ये बड़े-बड़े जज, कलेक्टर, तहसीलदार और थानेदार हैं, सबकी जड़ों में कहीं-न-कहीं खुशामद का पानी अवश्य पड़ा हुआ है।
और क्यों न हो, खुशामद कोई आज की या अनहोनी चीज तो नहीं। हम सबका सिरजनहार, अखिल विश्व का नियंता, खुद परमेश्वर ही जब महा खुशामदपसंद है तो हम धरती के तुच्छ मनुष्यों की क्या औक़ात ! वेद-शास्त्र, पुरान-कुरान, गीता-बाइबिल सब एक स्वर से कहते हैं कि उसकी प्रार्थना करो, उससे दुआएं मांगो, उसके सामने नाक रगड़ो, अपने को तुच्छ समझो, उसे सर्वशक्तिमान कहो। यही नहीं, उनका यह भी कहना है कि आप लाख पापी हों, लेकिन सारे जीवन में यदि एक बार भी आपकी खुशामद की टेर उस तक पहुंच जाए, तो बस, फिर जनम-जनम के पाप स्वयं ही कट जाते हैं। अजामिल, गीध, व्याध, गणिका और गजराज की

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