ठंड : आजादी : समाजवाद

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

ठंड कुछ जल्दी आ गई।
जी, हमारी शादी भी जल्दी हो गई थी और मुल्क में आज़ादी भी जल्दी आ गई।
मतलब ?
मतलब कि हम युवावस्था आते-न-आते पराधीन हो गए और देश के अर्थ को समझते-समझते आज़ाद हो गए।
जी !
जी क्या जी, अब हमें और हमारे देश, दोनों को कीमत चुकानी पड़ रही है।
कैसे ?
जी, हम दोनों ही ज़िम्मेदारियां से भाग रहे हैं। मन-ही-मन बड़बड़ा रहे हैं। कहीं का गुस्सा कहीं उतार रहे हैं। हम दोनों का ही परिवार बढ़ गयी है। समस्याएं बढ़ गई है। सुलझने में नहीं आ रहीं, इसलिए खीझ रहे हैं।
जी ?
हम अपना गुस्सा अपनी पत्नी पर उतारते हैं। पत्नी बच्चों पर उतारती है। और बच्चे, जो सामने पड़ जाए उसी पर उतारने लगते हैं।
यानी, समस्याओं का बोझ नहीं उतर रहा, गुस्सा उतर रहा है ?
जी हां !
यही हालत हमारे देश की है। जैसे चाव-चाव में हमने अपना ब्याह रचवा लिया था, वैसे ही हमारे नेता भी अपने सिर पर सेहरा बांधकर आज़ादी को घर ले आए। भाई जी, पराई बेटी को घर ले आना सहज है, मगर उसकी फरमाइशों को पूरा करना, उसके सपनों को संजोना, घर को बनाना और उसकी हिफाज़त करना आसान काम नहीं।
ठीक है।
क्या ठीक है ? अनुभवहीन, कामचोर, अस्वस्थ लोग जैसे किसी कल-कारखाने को नहीं चला सकते, वैसा ही हाल देश के मंत्रियों का है। यूं समझ लो जैसे आजकल के नौसिखिये डॉक्टर रोगियों के स्वास्थ्य और जीवन से खेल-खेलकर उपचार करना सीखते हैं, वही ट्रेनिंग आज हमारे सरकार चलाने वाले प्राप्त कर रहे हैं। यह दवा काम नहीं करती तो वह दो। दवा ने असर नहीं किया तो इंजेक्शन ठोंको। इंजेक्शन बेकार हो गया तो हटाओ, आपरेशन ही कर डालो। मरीज बचे या मरे, इसकी चिंता नहीं। चिंता एक्सपेरीमेंट (प्रयोग) करने की है।
हूं !
हूं क्या भई, जैसे ठंड जल्दी आई या जैसे आज़ादी जल्दी आई, वैसे ही देश की राजनीति में समाजवाद भी कुछ जल्दी आ गया है।
आखिर कहना क्या चाहते हो ?
यही कि ठंड का आना बुरा नहीं है। गर्मी शांत हो गई। मौसम सुहावना हो गया, लेकिन लोगों को जूड़ी ताप, मलेरिया आदि से बचने के लिए तैयार तो हो जाना चाहिए ? अगर इस ठंड ने आकर बीमारी फैला दी तो मौसम दुखदायी नहीं हो जाएगा ?
जी हां !
इसी प्रकार आज़ादी किसी राष्ट्र का जीवन है। पराधीनता शव है और स्वाधीनता शिव। लेकिन यदि शिव को

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