व्यंग्य पर व्यंग्य

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

आवश्यकता है साहित्य में ऐसे नये ढंग के व्यंग्य की जो तथाकथित सभ्य समाज में खप सके। आज के नामधारी पत्र-पत्रिकाओं में आसानी से छप सके। जिसे 'कॉफी' के साथ पिया जा सके। जो अपने पर छोड़कर सब पर हो। जिसकी चर्चा हर होंठ पर नहीं, लव पर हो।
जी हां लव ! यानी प्यार, 'आइ मीन मोहब्बत'। उस पर भी हावी हो जाए व्यंग्य की कुव्वत। जो अपनी धार से प्यार को भी मिसमार कर दे। जिसे लोगों ने सामाजिकता या 'कल्चर' के विशेषण दिए हैं, उन पर भी कातिलाना वार कर दे। जो जमी हुई सियासत को उखाड़ दे। उखाड़ न सके तो कम-से-कम कागज पर तो उसे पछाड़ दे। जो माया से कहे कि तुम सिर्फ काया हो। काया से कहे कि तुम भी ब्रह्‌म हो, ब्रह्‌म से कहे कि ब्रह्‌मानंदजी तुम कोरे भ्रम हो। जो रूप को कहे अपरूप। अपरूप ही जिसके लिए हो स्वरूप। हर अनगढ़ को बताए अनूप। जैसे पत्रकारिता में होता है 'स्कूप'। डिनर में होता है 'सूप'। कवियों के लिए होता है पनघट वाला सरस कूप। व्यंग्य वैसा ही हो जैसे कोई मिस्र का पिरामिड या भारत का ऐतिहासिक या अनैतिहासिक स्तूप। परंतु वह इनका समर्थक नहीं, 'बाइ नेचर' विरोधी हो। जु़बान का कड़वा और स्वभाव का क्रोधी हो। ज़रूरत है ऐसे व्यंग्य की। बड़ी कमी है साहित्य के इस अंग की। श्रीमतीजी ने नाश्ते में हलवा बनाया है, 'कटलेट' नहीं। मेज पर 'स्टील' का कटोरा है, 'प्लेट' नहीं। कहती हैं-कॉफी नहीं, दूध मिलेगा। पुराना शरीर चाय से नहीं चलेगा। क्या मज़ाक है ? सुबह-सुबह ही यह क्या 'नानसेन्स टाक' है। नये आदमी को चाहिए नया नाश्ता। उसका दूध, मक्खन और हलवे से क्या वास्ता ? दूध बछड़ों का शोषण है। हलवा आज के आदमी के लिए कुपोषण है। इस बात को हर जगह आज़माया जाता है। मक्खन खाया नहीं, लगाया जाता है। पर बड़ी मुश्किल है। अखबार के पाठकों की कलम की तीखी नोंक से, बातूनी झोंक से, जिस्मानी अर्ज़ से, शैली की नई तर्ज़ से बहकाया जा सकता है, पर घर में अपनी बीवी को नाश्ते की मेज पर कैसे समझाया जा सकता है ?
शासन की बात और है, अनुशासन की और। लेखन की बात और है, भाषण की और। भाषण में तो यह बात नये अंदाज से त्यौरी चढ़ाकर, मुंह बिचकाकर बखूबी कही जा सकती है कि साहित्य है क्या बला ? हारमोनियम, सारंगी, ढपली या तबला ? नासमझ लोगों को बहका दिया। ग़मज़दा मासूमों को बहला दिया। सिरफिरों को बरगला दिया। बस, बन गया साहित्य। यही हक़ीकत है। इसके अलावा साहित्य का न कोई मकसद है और न कीमत है। जिसके पास खेती नहीं है, दफ्तर नहीं है, बीवी नहीं है, घर नहीं है, यानी जो बेचारा है, हर तरफ से नाकारा ही नहीं, एक प्रकार से आवारा है, वह लिखे और पढ़े उसे। जिसे कहते हैं साहित्य या अदब अथवा 'लिटरेचर'। यह व्यंग्य नहीं, यथार्थ है। स्वार्थ नहीं, परमार्थ है कि साहित्य से किसी का हित नहीं हुआ। मयख़ाना, साक़ी, प्याला और पैमानों से बहुत नापा, मगर अदब से कोई बाअदब नहीं

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