झूठ बराबर तप नहीं

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

"शास्त्रों में लिखा है कि जब तक जान जाने का ख़तरा न हो, तब तक झूठ नहीं बोलना चाहिए !'' अगर नई दुनिया का शास्त्र मुझे बनाने को कहा जाए तो उसका पहला वाक्य यह हो -"सच तभी बोलना चाहिए, जबकि जान जाती हो।" झूठ बोले और पकड़े गए तो धिक्कार है ऐसे दांत घिसने पर ! झूठ बोलने का मज़ा तो यह है, होशियारी तो इसमें है कि झूठ बोलो, मगर झूठ न दिखाई दे।
आप झूठ बोलिए और फिर बोलिए, लेकिन भाई मेरे, तनिक सफाई के साथ ! इसी को दुनियादारी कहते हैं, इसी में सफलता छिपी है ! आपका पता नहीं, मैंने तो यह सिद्धांत बना रखा है कि-

"झूठ बराबर तप नहीं,सांच बराबर पाप ।
जाके हिरदे झूठ है, ताके हिरदै आप ॥"

और यक़ीन मानिए अपने इसी सुनहरे सिद्धांत की बदौलत, दिन-पर-दिन गोल हुआ जाता हूं और नज़र न लग जाए किसी की, बस सब तरह से पौ-बारह है। झूठ बोलने का बड़ा माहात्म्य है। अगर आप आज के वैज्ञानिक तरीके से झूठ बोलना सीख जाएं तो विश्वास कीजिए कि फिर ज़िंदगी में आपको कभी मायूस होने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। शर्त लगाकर कह सकता हूं, चंद दिनों की ही कसरत के बाद आपके पास ठाठदार बंगला, शानदार कार, चहकता हुआ रेडियो, बहकता हुआ दूरदर्शन, झुकता हुआ अर्दली और उचकती हुई अप्सराएं खुद न आ जाएं, तो कसम आपकी, मैं आज से ही झूठ बोलना छोड़ सकता हूं।झूठ कौन नहीं बोलता ? हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि यह संसार मिथ्या है। माता-पिता,पुत्र-कलत्र सब रिश्ते झूठे हैं। जग-व्यवहार सब मिथ्याचार है। दो-चार संत, फकीर और गांधी-महात्माओं को छोड़ दीजिए, दुनिया में इनका होना-न-होना हम झूठों के प्रचंड बहुमत में कोई अर्थ नहीं रखता। मेरा तो दावा है कि झूठ और सच की बिना पर अगर इस देश में चुनाव लड़ लिए जाएं तो हिंदुस्तान की एक भी सीट पर कांग्रेसियों का अधिकार नहीं रह सकता, हिंदुस्तान क्या सारी दुनिया में हम झूठों का ही सिक्का चलता है और वह दिन दूर नहीं जब धरती के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक हर जगह हमारी मज़बूत सरकारें कायम हो जाएंगी।
दरअसल दुनिया में और है भी क्या ? खाने को तीन छंटाक गेहूं, पहनने को तीन गज कपड़ा और बोलने को जी भर झूठ ! राशन और कंट्रोल के इस पिछड़े जमाने में अगर कहीं झूठ भी चोर बाजार में चली गई होती तो झूठ न मानिए, दुनिया से निन्यानबे प्रतिशत आदमी उठ गए होते !
दुनिया का दस्तूर ही ऐसा है कि बिना झूठ के आपकी गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती। जिस तरह चटनी के बिना भोजन में चटकारा नहीं आता, रूप भी बिना यौवन के किरकिरा होता है, इश्क बिना शायरी फीकी लगती है, उसी तरह बिना झूठ के भी कोई ज़िंदगी है ?
यह बिल्कुल झूठ है कि पहले ज़माने में झूठ बोलने वाले मर जाया करते थे। कम-से-कम मैं 80 साल से ऊपर का हो गया हूं। तबसे हजारों क्या लाखों बार झूठ बोलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा, पर क्या मज़ाल,

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