अगर गधे के सिर पर सींग होते ?

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

कुदरत ने अगर फुर्सत से किसी चौपाए को गढ़ा है तो वह है हमारा वैशाखनंदन। क्या सूरत और सीरत पाई है मेरे प्यारे सुकुमार गधे ने। जो मनोहरता और मासूमियत इस प्रजापति के जीवनाधार में दिखाई पड़ी, वह न तो हमें खेचरों में मिली, न खच्चरों में। लोग हाथी का बड़ा मोल-तोल करते हैं। वह बुद्धिमान कहा जाता है। हमें तो वह लंबकर्ण, मिंची-मिचीं आंखों वाला, निहायत थापकथैया ही नज़र आया। कहते हैं कि शेर जंगल का राजा है। जाने कैसा राजा है कि जिसे देखते ही डर लगता है। हमने जो राजा देखे हैं,उनके मूंछ होती है, न कि पूंछ। न उनके खून होता है, न नाखून। निहायत ही कमसिन, बड़े ही खूबसूरत, सजे-धजे गुड्डे-जैसे। और ऊंट ? कितना बेतुका। गर्दन मानो बचपन में किसी ने पकड़कर खींच ली हो। कूबड़ जैसे उसके उबड़-खाबड़ जीवन का प्रतीक हो। टांगें बांस-बांस लंबी, मगर पूंछ आदमी की अक्ल की तरह सूक्ष्म।
हमारे यहां पशुओं में गाय को बड़ा मान दिया गया है। हम हिंदू उसकी मां की तरह पूजा करते हैं, पर यह कैसी माता है,जो बिना चारे-पानी के दूध नहीं देती। गाय मरने पर वैतरणी पार कराती होगी। हमारे सहज-सिद्ध 'गर्दभराज' तो अपने आश्रयदाता को लादी सहित इसी जीवन में वैतरणी से पार कराते रहते हैं। रहा कुत्ता जिसके बारे में मसल मशहूर है कि- चाटे-काटे स्वान के दुहूं भांति विपरीत।
मगर गधे के साथ यह बात नहीं है। कम दाम का और बहुत काम का। न बहुत ऊंचा, न बहुत नीचा। न काठी की ज़रूरत, न इसे हांकने के लिए लाठी की ज़रूरत। मौज आए, उछल कर चढ़ जाइए। न बहुत पतला न बहुत मोटा, थोड़ी से थोड़ी जगह में बांध लीजिए। बांधने को भी जगह न हो तो घर के बाहर खुला छोड़ दीजिए, खड़ा रहेगा।
भारतीय नेता की तरह गधे की खाल बहुत मोटी होती है। कोई कुछ कह दे। कोई कुछ लगा दे। मगर यह एकदम निश्छल और निर्विकार। नेता तो मौके-बेमौके रैंक कर मुसीबत भी खड़ी कर देता है, लेकिन हमारे गधे देवता को ऐसी खराब आदत नहीं है। वह कभी भी बेमौके भाषण नहीं देते।
नेता जो जिम्मेदारी की कुर्सी पाकर यानी उनके शब्दों में, सेवा का अवसर मिलते ही आंखें भी फेर लेता है और हाथ नहीं रखने देता, मगर गधे पर जैसे-जैसे उत्तरदायित्व आता है, यानी बोझ पड़ता है, वैसे-वैसे ही वह विनयी, श्रमी और सेवाभावी होता जाता है। नेता तो केवल चुनावों के वक्त में ही काबू में आता है, मगर गधे को जब चाहे कान पकड़कर खींच लाइए। वह अत्यंत सेवाभावी, कभी इनकार नहीं करेगा।
गाय को चारा-पानी न दो तो वह खड़ी हो जाएगी, दूध नहीं देगी। मगर गधा भारतीय पत्नी की तरह भूखा-प्यासा रहकर भी काम में जुटा रहता है। पत्नी तो बड़बड़ाती तब भी है, यह तो मुंह से एक शब्द भी नहीं कहता। गृहस्वामिनियां तो तुनककर असहयोग-आंदोलन भी छेड़ देती हैं, मगर यह अपने स्वामी से रूठकर कभी कोप भवन में नहीं जाता। पत्नियों का तो मायका है, उसकी धमकी होती है, लेकिन गधा इन सबको तिलांजलि देकर स्वामी-सेवा में संलग्न है। कलियुग में शनैःशनैः पतिव्रताओं की संख्या घट रही है। एक समय शायद ऐसा भी आ जाए कि यह पवित्र 'पतिव्रता' शब्द केवल शब्दकोश में ही दिखाई पड़े। पर हमें पूरा विश्वास है कि चाहे संविधान बदले, नये-नये कानून बनें, गधों को भी तलाक का अधिकार प्राप्त हो जाए, उन्हें भी अपने स्वामी की संपत्ति में समानाधिकारी घोषित कर दिया जाए, लेकिन कुछ भी हो, गधा अपने शाश्वत धर्म को कदापि नहीं छोड़ेगा। भारत की पतिव्रताएं किसी समय कैसी हुआ करती थीं, आने वाले युग में रिसर्च-स्कॉलर गधे को निकट से देखकर ही उसका कुछ अनुमान लगाया करेंगे। स्वामी चाहे बूढ़ा हो, चाहे अबोध, काना हो या कपटी, कुरूप हो या कोढ़ी, गधे को सिर्फ सेवा से ही काम है।
हम प्रायः यह तय नहीं कर पाते कि आस्तिक रहें या नास्तिक ? खुदा से हमें कई शिकायतें हैं। वह खुदी में खोया है, उसे दूसरों की क्या पड़ी !

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