मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

किसी और की बात मैं नहीं जानता, लेकिन मैं तो सचमुच अपनी पत्नी का अत्यंत कृतज्ञ हूं। यों जन्म मुझे अपनी मां से मिला है, पालन-पोषण और संस्कार भी शायद उन्हीं से प्राप्त हुए होंगे, पर इस बात को आज सबके सामने स्वीकार करने में मुझे ज़रा भी हिचक नहीं है कि जहां तक मेरे आदमी बनने का प्रश्न है, वह मुझे मेरी 'बहुमाता' ने ही बनाया है। मैं उन्हीं का (बनाया) आदमी हूं।
वे न होतीं तो मैं आज कहीं का न होता ? आज उन्हीं की कृपा से मैं एक लंबे-चौड़े ससुराली कुटुंब का जीजा और उनके मुहल्लेभर को साला बनाने योग्य हूं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि अगर मेरे पूज्य पिताजी ने मेरी शादी न करने का फैसला, बिना मुझसे पूछे ही कर लिया होता तो कवि, लेखक और पत्रकार बनना तो दूर, मैं स्वयं अपने बच्चों का पिता बनने से भी रह जाता। यह सब कुछ उन्हीं का प्रसाद है कि समाज में आज मेरे लिए भी पैर टिकाने को जगह है, सोसायटी में कभी-कभी मुझे भी सभ्य समझ लिया जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि दिल्ली में रहने को एक टीन भी किसी कदर किराये पर मिली हुई है।
क्या बात कहूं मैं उनकी ? भगवान हजारी उम्र करे उनकी। वे सचमुच इतनी भली हैं कि जबसे हुजू़र ने हमारे घर को रौनक-अफरोज़ फरमाया है, हमें तो सिर्फ आराम करने के सिवा कोई काम ही नहीं रह गया। झाड़ा-बुहारा घर, धुले-धुलाए कपड़े, पका-पकाया खाना, बिछी-बिछाई खाट और बिना मांगे पानी-जब आदमी को अनायास ही मिलने लगे तो उसे महाकवि घाघ के शब्दों में "उहां छांड़ि इंहिवै बैकुंठा'' नज़र आने लगता है। हमारी क्लीन-शेव सूरत, सजी-संवरी देह और सलीके के कपड़ों को देखकर मित्र लोग हैरान होते हैं कि इस 'बछिया के ताऊ' में इतनी अक्ल कहां से आगई ? मगर उन्हें यह नहीं मालूम कि यह तो किसी और का ही वरद-हस्त है, जिसने हमारे ऊपर गिरने वाले अभावों के गिरि गोवर्धन को अधर ही में थाम रखा है।
उनके श्री चरणों का सुस्पर्श पाकर, सच कहूं इस घर की दुनिया ही बदल गई है। घर के बर्तन, कपड़े, फर्नीचर, चित्र, किताबें-यह समझिए कि घूरे-से लगने वाले इस घर का सारे-का-सारा वातावरण ऐसा दमक उठा है, मानो चंडीगढ़ का रॉक गार्डन हो। अब हमें न तो रूमाल की ख़ातिर सारी अलमारी उलट देनी पड़ती है और न कविता के कागजों की तलाश में ताक से लेकर कूड़े के कनस्तर तक की दौड़ लगानी पड़ती है। हर एक चीज कायदे से, अपने समय पर, इस सफाई और सुंदरता के साथ स्वयं होती चलती है कि हम तो अपनी 'होम-गवर्नमेंट' की इस शासन-कुशलता पर दंग रह जाते हैं। शादी के पहले जब हम इन्हें पसंद करने गए थे (हालांकि वह हमारी हद दर्जे़ की बेवकूफी थी) तब सपने में भी यह ख़याल नहीं आया था कि इसी सीधी-सादी, दुबली-छरहरी, गऊ-सी लड़की में इतनी 'एडमिनिस्ट्रेटिव' पॉवर और ये-ये गुल भरे होंगे।

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