नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

(उस दिन अचानक आचार्य रामचंद्र शुक्ल फोन पर आगए। उन्होंने परलोक में भी साहित्य प्रचारिणी सभा की स्थापना कर डाली है और हिन्दी के आधुनिक साहित्य का नये सिरे से इतिहास लिखना प्रारंभ कर दिया है।)
"हमारी-आपकी तो शायद कहीं मुलाकात हुई है ?'' शुक्लजी ने हमसे फोन पर पूछा।
"जी हां, कई बार !''
"शायद आप काशी के हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में बाबू गुलाबराय के साथ आए थे। तब मेरा मकान बन रहा था।'' आचार्य ने कहा।
"जी हां, हम लोग आपके मकान पर हाज़िर हुए थे। उस वर्ष आपको मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था।''
"हां, वह बड़े मौके पर मिला था। मकान के सिलसिले में उस समय रुपये की बहुत सख्त ज़रूरत थी। कहिए, कुशल से तो हैं ?''
"जी हां, कृपा है आपकी।''
"सुनिए, एक बात पूछनी थी,'' शुक्लजी ने कहा, "आप जो स्वर्गस्थ साहित्यकारों के इंटरव्यू ले रहे हैं वे कल्पित हैं, या वास्तविक ?''
हमने उत्तर दिया, "शुक्लजी महाराज, अगर आप वास्तविक हैं तो लेखमाला भी वास्तविक है। अभी टेलीविजन तो दिल्ली में घर-घर चालू हुआ नहीं। इसलिए आवाज़ ही सुनी जाती है, शक्ल तो सामने आती नहीं।''
"शक्ल भले ही सामने न आए, मगर जो सामग्री सामने आ रही है, वह अदभुत है। क्या बताऊं, मैं तो जल्दी ही धरती से उठ गया, नहीं तो अपने इतिहास में आपका उल्लेख अवश्य करता।''
हमने कहा, "कोई बात नहीं। हमें तो आपके फोनिक आशीर्वाद से ही तसल्ली है। मगर क्या आप आजकल का साहित्य देखते हैं ?''
"वह तो अपना पुराना व्यसन है। हम लोगों ने यहां भी एक साहित्य प्रचारिणी सभा खोल ली है। बाबू श्यामसुंदर दास उसके मंत्री है और भारतेंदुजी अध्यक्ष। पं. प्रतापनारायण मिश्र तो पहले से थे ही, इधर नवीनजी के आने से महफिल का रंग जमने लगा है। अक्सर नये साहित्य के संबंध में चर्चा होती ही रहती है।''
"तो नये हिन्दी साहित्य के संबंध में आपके क्या विचार हैं ?'' हमने आचार्य रामचंद्र शुक्ल से पूछा।
"बात यह है.....हलो-हलो! सुन रहे हैं न,'' शुक्लजी ने कहा।
"हां, कुछ फोन में कड़कड़ की-सी आवाज़ आ रही है।''
शुक्लजी कहने लगे, "मैं शुक्ल-परवर्ती साहित्य को आधुनिक काल की चार धाराओं में विभक्त करता हूं। हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि इस काल में चार शाखाओं में हुई।''
"वे कौन-कौन सी शाखाएं हैं, शुक्लजी" ,हमने कागज-पेंसिल सम्हालते हुए कहा।


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