रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

(तीन सप्ताह पूर्व हम रहीम खानखाना की कब्र पर अपना लेख लिखकर इसलिए रख आए थे कि उनकी पवित्र रूह उसे देख ले और संपुष्ट कर दे। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। महाकवि रहीम ने वह लेख रिजेक्ट कर दिया और अपने मज़ार से कहा कि वह इस संबंध में उनके विचार हमें बता दे। मज़ार साहब ने क्या कहा, यह इस लेख में ब्योरेवार दिया गया है।)
लेखक को निडर होना चाहिए। हम भी किसी से डरते नहीं। पर उस दिन हमारे छक्के छूट गए। फोन सांय-सांय, सूं-सूं कर रहा था। उसमें से कभी किलकारी निकलती थी तो कभी हू-हू ! लगता था जैसे कोई वृक्ष टूटकर गिर रहा हो और कभी-कभी पत्थरों के टूटकर चटखने की-सी आवाज़ भी सुनाई पड़ जाती थी। हम अभी तक फोन पर मधुर कंठों को ही सुनने के आदी थे, पर आज जो अट्टहास सुना तो घिग्घी बंध गई। पंखे के नीचे बैठे-बैठे भी हमें पसीना आगया था। घबराकर हमने फोन बंद कर दिया। न जाने कौन बला है ?
मगर घंटी फिर घड़ियाल की तरह घनघना उठी। सुनाई दिया, ''डर गए !''
स्वर इतना भारी और भैरव था कि सहसा हमसे जवाब देते न बना। कुछ सेकंड के बाद हमने साहस बटोरकर पूछा, "कौन हैं आप ?''
उत्तर में पुनः अट्टहास ध्वनित हुआ। एक बार तो हमें लगा कि रिसीवर हाथ से छूटकर अपनी इहलीला समाप्त करने पर उतारू है, पर हमने उसे मज़बूती से पकड़े ही रखा। दूसरे हाथ से कुर्सी का हत्था मज़बूती से पकड़ लिया। फोन पर कोई कह रहा था "जनाब, मैं आदमी नहीं हूं।''
वह तो हम पहले ही समझ गए थे कि आज हमारा पाला आदमी से नहीं पड़ा है। अवश्य ही कोई भूत या जिन्न है। टेलीफोन पर हमने साहित्यकारों जैसी बातचीत करने का सिलसिला शुरू किया। पूछा,
"तब आप कौन हैं ? क्या चाहते हैं ?''
ऐसा लगता है कि हमें ही नहीं, एक्सचेंज में काम करने वाली लड़कियों को भी इस वार्तालाप से कंपकंपी आगई थी। कारण, एकाएक फोन कट गया और बाद में जब पुनः सिलसिला जुड़ा तो लाइन पर लड़की नहीं, कोई सरदारजी बैठे थे।
शायद सरदारजी के लाइन पर आने से या किसी अन्य कारण से इस बार की बातचीत अपेक्षाकृत मुलायम स्वर में आरंभ हुई। सुनाई दिया, "आपको सुनकर हैरानी तो होगी, मगर मैं आदमी नहीं, उसका मज़ार बोल रहा हूं।''
"मज़ार ! किसका मज़ार ?'' हमारे मुंह से निकला।
उधर सरदारजी कह रहे थे, "देख्या तो। साडे हथ पैंदयां ई भूत पत्थर बन गया। सुन लो गल्लां।''
हमें सुनाई दिया, "ठीक है, मुझे पत्थर कह सकते हो। बना मैं पत्थरों के टुकड़ों से ही हूं। पर एक बेहतरीन और आला इंसान को अपने आगोश में सदियों से छिपाए रहने के कारण मेरे पत्थर भी पिघल गए हैं। ये खुद खंड-खंड होकर भी अखंड इंसानियत पर आंसू बहाया करते हैं। आप समझे ! मैं रहीम खानखाना का मज़ार हूं। नई दिल्ली में हुमायूं के मकबरे के पास वीराने में अकेला खड़ा हूं। आप उस दिन अपना मज़मून (लेख) उनकी कब्र पर रख आए थे। खानखाना ने हुक्म दिया है कि मैं आपसे उस बारे में बातें कर लूं।''

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