कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

(महाकवि सूरदास ने स्वर्ग से फोन किया है कि मेरे साथ हिन्दी के इतिहासकारों ने भारी अन्याय किया है। उसका प्रतिकार होना चाहिए। कौन कहता है कि मैं अंधा था। मुझे तो सर्वत्र सब कुछ दिखाई देता था। हां, मेरी आंखों में मोतियाबिंद उतरा था। मथुरा के एक डॉक्टर ने मुझे चश्मा भी दिया था। वह एक दिन गिरिराज पर्वत पर गिरकर टूट गया।)

सवेरे-सवेरे हम त्रिफला से अपनी आंखें धो रहे थे कि फोन की घंटी बजी। बेटी गुड्डी ने बताया, "चाचाजी, टरंककाल है।''
जल्दी-जल्दी तौलिये से अपना मुंह पोंछते-पोंछते हमने पूछा, "कहां से है ? कौन बोल रहा है ?''
गुड्डी बोली, "पता नहीं, कोई बुड्ढा गंवई बोली में बोल रहा है। जल्दी आइए।''
हमने रिसीवर कान पर रखते हुए कहा, "जी'' !
"मैं सूरज बोल रह्‌यौ हूं !''
हमने कहा, "क्षमा कीजिए, मैंने पहचाना नहीं।''
उत्तर मिला, "मैं दिल्ली ते आठ मील उरै सीही गांव कौ रहिबै बारौ हूं। बाबूजी, मेरे संग बड़ौ अन्याय भयौ है।''
हमने अन्यमनस्कता से पीछा छुड़ाने के लिए कहा, "सीही तो गुड़गांवा जिले के अंतर्गत है। हरियाणा के मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता। आप अपने एम.एल.ए. या जिला अधिकारि से मिलिए। क्या कोई ज़मीन-ज़ायदाद या पंचायत का मामला है ?''
उधर से आवाज़ आई, "नाहिं भइया, ज़मीन-ज़ायदाद तो हमारे पुरखन के ऊ नाहिं हती। जीवनभर मैं काऊ की पंचायत में नाहीं पर्‌यो।''
"तो फिर किसी से फौजदारी होगई होगी ? तुम्हारे गांव का सरपंच आजकल कौन है ? जाट, लाला या कोई ब्राह्‌मण देवता ?''
उत्तर कुछ अजीब सा मिला, "भइया, फौज़दारी तो मेरी एक बेर बंसीवारे ई ते भई हती। वा सों मैंने स्वाफ-स्वाफ कह दई हतीः
"बांह छुड़ाए जात हौ,
निबल जानिकें मोहि।
हिरदै ते जब जाहुगे,
मरद बदोंगो तोहि॥

का तुम अबई तलक मोय नाहिं पहिचाने ?''
हम एक क्षण के लिए सकते में पड़ गए। परंतु दूसरी ओर से हमें तुरंत सुनाई दिया, "मैं सूरदास हूं। गुसांई तुलसीदासजी ने मो ते कही हती कै मैं आपकूं फोन करि लऊं। फोन कौ नंबर हूं उननें कृपा करिकें बताय दियौ हो। सो तुम कृपा करिकें मेरी बात सुनौ। और कछु करि सकौ तो करौ।''
हमने प्रणाम करते हुए कहा," महाकवि, आज्ञा कीजिए ! क्या सेवा है ?''
सूरदासजी बोले, "सेवा तो जीव कूं केवल श्रीनाथजी की करनी चइए। मोय तौ एक भ्रांति दूर करनी है। ताही तें आपकूं कष्ट दियौ है।''
"आज्ञा कीजिए !'' विनय और पुलक भाव से हमने कहा।
"भइयाजी,'' महात्मा सूरदास ने कहना प्रारंभ किया, "लोग मोहि सूरदास कहें हैं और मोहि जन्मांध मानें हैं। पै जि बात है नाहिं। थोरौ-थोरौ तो मोहि अंत समय तक दिखाई देतौ रह्‌यौ हो।''
"परंतु सूरदासजी," हमने प्रश्न किया, "अष्टसखान की वार्ता में तो ऐसा लिखा है कि, "सो सूरदासजी जन्मांध हे। आंखिन के स्थान पे उनके गढेला हते!"

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