अगर कविता में 'माने' न होते

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

अगर कवि की कविता में अर्थ न हो, तो बहुत से अनर्थ होने से बच जाएं। जैसे भंवरों को रातभर कमलों में बंद रहना न पड़े। बेचारे राजहंसों को दूध और पानी अलग-अलग करने की परेशानी न उठानी पड़े। चकोरों को जबरन चिनगारियां न चुगनी पड़ें। चातकों को विरहिणियों का कोपभाजन न बनना पड़े। सृष्टि के ये महत्त्वपूर्ण प्राणी कविता से निकलने वाले विशिष्ट अर्थों के कारण पीड़ित हैं।
यह कविता से निकलने वाले अर्थ की ही कृपा का फल है कि शीतल चंदन अंग पर चर्चित होकर भी दाह उत्पन्न करता है। क्यारियों में महके हुए गुलाब अंगारों जैसे सुलगते हैं और पूर्णमासी का सुधावर्षी चंद्रमा अपनी किरणों से अमृत नहीं, गरल बरसाता है।
यदि कवि की कविता में अर्थ न हो तो फरहाद को शीरीं के लिए पहाड़ न काटने पड़ें। मजनूं को लैला के लिए पत्थर न खाने पड़ें। राम को सीता का पता खंजन, शुक, कपोत, मृग और मीनों से न पूछना पड़े और कृष्ण को राधा की ख़ातिर कभी सपेरा, कभी मनिहारिन, कभी फुलवा बेचने वाली न बनना पड़े। इतना ही नहीं, यदि कवि की कविता में अर्थ न हो तो हिंदुस्तान का टनों कागज, मनों स्याही और अपरिमित परिश्रम नष्ट होने से बच जाए। स्कूलों और लाइब्रेरियों में बहुत-सी अलमारियों का खर्च बच जाए। स्कूलों के बच्चे तो कविताएं रटने से बचें ही, अध्यापक भी उसके खींच-खींच कर अर्थ लगाने से बच जाएं। तब साहित्य का इतिहास भी इतना भारी-भरकम न रहे। समालोचकों का भी सिरदर्द हल्का हो ले। तब निश्चय ही संपादकों को कविताएं छाटंने में जो व्यर्थ समय गंवाना पड़ता है, उसकी भी बचत हो जाए।
फिर एक बड़ा काम और भी हो, सारा झगड़ा अर्थ का ही तो है। कविता से अगर अर्थ निकल जाए तो फिर संगीत और काव्य में जो बहुत दिनों से वर्गभेद चला आता है वह दूर हो जाए और ये दोनों समाजवादी सिद्धांतों के आधार पर सही रूप से विकसित हो सकें। जब संगीत, कला, चित्रकला और मूर्तिकला बिना अर्थों के समाज में समादृत हो सकती हैं, तब काव्य-कला क्यों नहीं हो सकती ?
वैसे यह बात है भी व्यर्थ कि कविता में अर्थ देखे जाएं। क्योंकि कविता कभी किसी को सीधे अर्थ देती भी नहीं। अब आप देखिए कि कविता जूही की कली पर है और अर्थ उसके कुछ के कुछ निकल रहे हैं। कविता लिखी हुई कुकुरमुत्तों पर है और लोग समझ रहे हैं कि इसका संबंध हमसे है। बात मधुशाला की कही जा रही है, अर्थ यज्ञशाला के लगाए जा रहे हैं। गीत पनघट पर है और व्याख्या वेदांत की हो रही है। जलाया आकाशद्वीप जा रहा है, अर्थ आशा-निराशा के झूले में झूल रहा है। इन सब बातों से सहज सिद्ध है कि कविता का वह अर्थ नहीं होता जो लगाया या बताया जाता है। असल में कविता का अर्थ वह होता है जो अक्ल में नहीं आता। जब अर्थ के साथ यह दिक्कत है तो क्यों व्यर्थ उसके चक्कर में पड़ा जाए ? अच्छे कवियों ने कभी अर्थ की चिंता नहीं की या यों कहें कि वे कभी अर्थ के पीछे नहीं दौड़े, बेशक वे इसलिए महाकवि कहलाए कि लोग उनकी कविताओं के अर्थ नहीं लगा सके। छायावाद हिन्दी में इसीलिए हावी होगया कि लोगों से उनकी कविताओं के अर्थ नहीं निकलते थे। आज की नई कविता इसलिए विशिष्ट स्थान प्राप्त कर रही

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