यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते तो जो होता वह तो होता, लेकिन मथुरा की भूमि में पैर रखने से पूर्व ही वह नीलाम अवश्य कर दिए जाते। कारण कि काला हो या गोरा, पतला हो या मोटा, अकेले हो या गृहस्थी के साथ, जो भी मथुरा की ओर मुंह करता है, उसे अपनी नीलामी के लिए तैयार रहना पड़ता है। भगवान कृष्ण भी इस सौभाग्य से वंचित नहीं रह सकते थे। मथुरा से तीन-चार स्टेशन पूर्व ही माथे पर तिलक लगाए, कंधे पर अंगोछा डाले, हाथ में लाठी लिए कोई तगड़ा-सा व्यक्ति उनसे मिलता, कुछ बातें करता और फिर अगले किसी स्टेशन पर हमारे कृष्ण-कन्हैया की बोली लगने लगती। सौदा होने लगता कि यह यात्री कितने का आसामी है ? इससे कितनी भेंट-दक्षिणा मिल सकती है ? उसी के आधार पर बोलियां लगतीं तथा मथुरानाथ को पता भी नहीं चलता और वह नीलाम कर दिए गए होते।
किए होंगे कभी कान्हा ने गोपियों के चीर-हरण, मथुरा स्टेशन पर आते ही इस बार उनका चीर-हरण शुरू हो जाता। कोई उनका पटुका पकड़ता तो कोई पीतांबर खींचता। कोई उनकी लकुटी की ओर लपकता तो कोई वनमाला की ओर। कोई नाम पूछता तो कोई गाम पूछता। कोई जाति पूछता तो कोई गोत पूछता। कोई कहता कि आप हमारे यजमान हैं, कोई कहता हम आपके पंडा हैं। कोई कहता कि हम आपके ही नहीं, आपकी जातिभर के पंडा हैं। कोई कहता कि गांव-भर हमारा यजमान है। कोई कहता कि आपके पिताजी ने हमें शैयादान किया था। कोई कहता कि हमारी बही में तुम्हारे दादा के दस्तख़त हैं। कोई कहता कि यह झूठा है। दूसरा कहता कि यह दग़ाबाज है। तीसरा कहता कि ये दोनों ही कंपनी वाले हैं, सनातन पंडा तो हम ही हैं। चकाचक भांग, धकाधक हलुआ, हरी-हरी पातर, पीले-पीले लडुआ। छनाछन चांदी आती रहे। ग्वाल-बाल खाते, मौज उड़ाते रहें। हाकिम की गादी पै, सूम की छाती पै। सरकार चलो हमारे यहां। जमुना किनारे ऊंची धर्मशाला, टट्टी-फिलस, बिजुरी की रोशनी चमाचम।
भगवान कृष्ण को उनकी बातों में रस आते देख, दूसरा उसे ठेलकर आगे आता। कहता, सरकार यह तो भंगेड़ी, गंजेड़ी, नशेबाज आदमी है। इनकी बातों में न आइए। हमने शास्त्री परीक्षा पास की है। हम गीता-भागवत शास्त्रीय सिद्धांतों के अनुसार आपको सफल कर्मकांडों से युक्त ब्रज की यात्रा कराएंगे। इन अपठित मूर्खों में आप न फंसिए। श्रीकृष्ण इस पठित-पंडित की बात पर ठीक से ध्यान भी न दे पाते कि एक सूंड-सूंडार, धांध, धुंधारे, तुन्दिल बदन पहलवान भीड़ चीरते हुए उन तक पहुंचते और भगवान कृष्ण को लगता कि कंस


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