अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

ताजमहल और जो हो, प्रेम का प्रतीक, हरगिज नहीं है, क्योंकि आप किसी भी भले और बड़े आदमी से पूछ लीजिए, वह यही कहेगा-प्रेम पार्थिव नहीं होता। ताजमहल में तो पत्थर ही पत्थर हैं। ऐसा भी कहीं नहीं कहा गया कि लाल पत्थर क्रांति का और सफेद पत्थर प्रेम का प्रतीक होता हो, क्योंकि व्यवहार में देखा गया है कि गोरे-चिट्टे श्वेत रंग वालों में और चाहे जो गुण हों, प्रेम के कीटाणु उनमें प्रायः नहीं पाए जाते।
अगर क्षमा करें तो मुझे आपसे एक बात और कहनी है। वह यह कि पति-पत्नी के बीच जो प्रेम की कल्पना करता है, उसके अक्लमंद होने में कम-से-कम मुझे तो संदेह है। प्रेम उड़ने वाले कबूतरों से तो हो सकता है, पर चौबीस घंटे, घर में विराजमान रहने वाली कबूतरी से नहीं। आप ही बताइए, जो सुबह-सवेरे चादर खींचकर बिस्तर से उठा दे, थोड़े से पैसे देकर ढेर-सा सामान लाने के लिए झोला पकड़ा दे, पैसे-पैसे का हिसाब ले और आने-आने के लिए जान दे, जो न चाय पीने दे, न सिनेमा देखने दे, न किसी से मिलने-जुलने दे, न लिखने दे, न पढ़ने दे, उससे कहीं प्रेम हो सकता है ? लेकिन यह जो प्रेम नाम का पदार्थ है, वह हरगिज़ नहीं हो सकता।
हमें मालूम नहीं कि बेचारे शाहजहां को मुमताज महल से कितना प्रेम था, क्योंकि महलों और हरमों की बातें बाहर ज़रा कम ही आती हैं। गरीबों के प्रेम के किस्से तो अफसाने बन जाया करते हैं, पर बड़े आदमियों के लिए मोहब्बत फसली आम की तरह हुआ करती है। चूसा और गुठली फेंक दी। आम को निरखते रहना, उसकी तारीफ के पुल बांधना कि वह किस पेड़ का और किस बगीचे का है-उसके गुण गाना, अहा ! वह आम का वृक्ष कितना विशाल होगा ? जिस मंजरी में से यह आम फूटा है वह कितनी महकी होगी ? माली ने किस यत्न से इसको डाल से उतारा होगा ? वह कितना ऊंचा कलाकार होगा ? पाल ने किस ममता और स्नेह से इसे गदगदाया होगा। मंडी में आया होगा तो इसने किस तरह हजारों को ललचाया होगा ? और वाह रे आम ! तू, तू ही है। अब ये हैं न बे-सिर पैर की बातें। आपको आम खाने से मतलब या पेड़ गिनने से ? बड़े लोग मोहब्बत नहीं किया करते। उन्हें इश्क से नहीं, हुस्न से लेना होता है। वह सीरत पर नहीं, ज़रा-सी देर के लिए सूरत पर रीझते हैं।
और बीवियों की शक्ल- तौबा-तौबा ! सुबह-सुबह जमादारिन जैसी, दिन चढ़ते भटियारिन जैसी, दिन ढलते आम मुख्तयारिन जैसी और रात होते-होते सिंह सरदारिन जैसी। आप कहते हैं प्रेम। बेचारा पति जुबान तक तो खोल नहीं पाता, प्रेम क्या खाक करेगा ? प्रेम करने के लिए मियां, डेढ़ हाथ का कलेजा चाहिए, सवा बालिश्त का भेजा चाहिए और चाहिए ढेर सारी फुरसत। अगर आप बीवी वाले हैं तो यह अच्छी तरह जानते होंगे कि शादी करने के बाद आदमी के भेजे और कलेजे वैसे ही गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सिर से सींग। बीवी इन तीनों में से एक चीज बेचारे शौहर के पास नहीं छोड़ती। आप फुरसत से टांगें फैलाकर बैठ तो जाइए घर में। वे लंतरानियां सुनाएगी कि होश हिरन हो जाएंगे। ज़रा भी रंगीनी जताइए तो घूर-घूरकर देखने लगेगी-यह


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