नमो-नमो यमुना महारानी !

(ब्रज-काव्य की कविताएं )  

भूमिका
गोपिन के अधरान की भाषा
अनंग-सी अंगना
योजना बनाओ तो ........
खर्राटे
रास-रसोत्सव
गिरिराज महाराज की जय !
नमो-नमो यमुना महारानी !
मथुरा-महिमा ?
यारो, मारो डींग !
रसिया
हँसीले दोहे
हम और अहम

 

नमो-नमो यमुना महारानी !

गंगा घहरावैं, युमनाजी मंद-मंद बहैं,
वहाँ रोड़ी-रोड़ा, यहाँ कदमन की छय्या।
वहाँ पड़ै हड्डी, यहाँ चढ़ैं दूध फूल,
वहाँ चंडी चेतै, यहाँ महाविद्या मय्या।
वहाँ कूँडी-सोटा और चीमटा-चिलम चलैं।
यहाँ ठौर-ठौर जमे विजया-घुटय्या।
वहाँ मिलैं साधूजन, यहाँ मिलैं स्वादू 'व्यास'
वह हर की पैंड़ी, यह हरि-जनमय्या॥

('गोपिन के अधरान की भाषा' से, सन्‌ 1998)

 

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