गोपिन के अधरान की भाषा

(ब्रज-काव्य की कविताएं )  

भूमिका
गोपिन के अधरान की भाषा
अनंग-सी अंगना
योजना बनाओ तो ........
खर्राटे
रास-रसोत्सव
गिरिराज महाराज की जय !
नमो-नमो यमुना महारानी !
मथुरा-महिमा ?
यारो, मारो डींग !
रसिया
हँसीले दोहे
हम और अहम

 

गोपिन के अधरान की भाषा

ये अनुराग के रंग रंगी,
रसखान खरी रसखान की भाषा।
यामैं घुरी मिसुरी मधुरी,
यह गोपिन के अधरान की भाषा।
को सरि याकी करैं कवि 'व्यास'
ये भाव भरे अखरान की भाषा।

सूर कही तुलसी नैं लही,
प्रभु पांयन सौं परसी ब्रजभाषा।
देव-बिहारी करी उर धारन,
मोतिन की लर-सी ब्रजभाषा।
भूषन पाय भवानी भई,
कवि 'व्यास' हिये हरषी ब्रजभाषा।
मतिराम के आनन में उमहीं,
घन आनंद ह्‌वै बरसी ब्रजभाषा।

 

('गोपिन के अधरान की भाषा' से, सन्‌ 1998)

 

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