मुक्ति-पर्व

( वीर रस की कविताएं )   

भूमिका
नेताजी का तुलादान
खूनी हस्ताक्षर
हिन्दुस्तान हमारा है
मुक्ति-पर्व
प्रयाण-गीत
शहीदों में तू नाम लिखा ले रे !
 

 

आज राष्ट्र का मुक्ति-पर्व है जागो कवि की वाणी;
फूंको शंख विजय का, जय हो भारत-भूमि भवानी !
फूलो फूल, लताओ झूमो, अम्बर बरसो पानी;
मन-मयूर नाचो रे आई प्रिय स्वतन्त्रता रानी !!

वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर जूझी लक्ष्मी रानी;
वीर पेशवा नाना ने कर दिया खून का पानी।
तांत्या टोपे ने जिसकी असली कीमत पहिचानी;
लड़ा गया संग्राम गदर का जिसकी अमर कहानी ॥

वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर बिस्मिल थे शैदाई;
जूझ गए आज़ाद पार्क में डटकर लड़ी लड़ाई।
फाके किए यतीन्द्रनाथ ने, मारे गए कन्हाई;
भगतसिंह ने हंसते-हंसते खुलकर फांसी खाई॥

वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर बापू जग में आए;
मुक्ति-युद्ध के लिए जिन्होंने नये शास्त्र अपनाए।
राष्ट्रपिता के इंगित पर दी भारत ने कुर्बानी;
साठ वर्ष तक लड़े सिपाही दिन और रात न जानी॥

वह स्वतन्त्रता जो कि हमें प्राणों से भी प्यारी थी;
वह स्वतन्त्रता जिसके हित डांडी की तैयारी थी।
वह स्वतन्त्रता जिसकी खातिर असहयोग अपनाया;
मिट्टी में मिल गए किन्तु झण्डे को नहीं झुकाया॥

बयालीस के वीर बागियो, जान खपाने वालो;
'करो-मरो' के महायज्ञ में गोली खाने वालो !
जेल-यातना सहने वालो सत्त्व गंवाने वालो;
विजय तुम्हारे घर आई है आओ इसे सम्हालो॥

उन्हें राष्ट्र का नमस्कार जो काम देश के आए;
सेवक बनकर रहे चने तसलों में रखकर खाए।
भारत उनका ऋणी जिन्होंने हंसकर कष्ट उठाए;
सदा कर्मरत रहे नाम अखबारों में न छपाए॥

नेताजी तुम कहां छिपे हो ? याद तुम्हारी आती;
भारत के बच्चे-बच्चे की भर-भर आती छाती।
'दिल्ली चलो' तुम्हारा नारा देखो पूर्ण हुआ है;
परदेशी का भाग्य-सितारा पिसकर चूर्ण हुआ है॥

उठो बहादुरशाह कब्र से किला लौट आया है;
हटा यूनियन जैक, तिरंगा उस पर लहराया है।
औंधे तम्बू अंग्रेजों के, पड़ी बैरकें खाली;
तेरी दिल्ली आज मनाती घर-घर खुशी दिवाली॥

सुनो तिलक महाराज ! स्वर्ग में भारत के जयकारे;
तुम्हें जेल में रखनेवाले खुद लग गए किनारे।
जन्मसिद्ध अधिकार हमारा हमने छीन लिया है;
ब्रिटिश सल्तनत के तख्ते को तेरह-तीन किया है॥

सदियों पीछे आज जमाना ऐसा शुभ आया है;
जब अशोक का चक्र पुनः भारत में फहराया है;
जबकि हिमालय का सिर ऊंचा गंगा गौरव गाती;
जब भारत की जनता जय नेहरू, पटेल की गाती ॥

मुक्त पवन में सांस ले रहे हैं अब भारतवासी;
पूरब में प्रकाश फैला है स्वर्णिम उषा प्रकाशी।
भारतवर्ष स्वतन्त्र हुआ है गाओ नया तराना;
नया एशिया जागा है अब बदला नया ज़माना॥


('कदम-कदम बढ़ाए जा' से, सन्‌ 1993)
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