नेताजी का तुलादान

( वीर रस की कविताएं )   

भूमिका
नेताजी का तुलादान
खूनी हस्ताक्षर
हिन्दुस्तान हमारा है
मुक्ति-पर्व
प्रयाण-गीत
शहीदों में तू नाम लिखा ले रे !
 

 

दर्शक जनता की आंखों में,
आंसू छल-छल कर आए थे।
बाबू सुभाष ने रुद्ध कण्ठ से,
यूं कुछ बोल सुनाए थे-

''हे बहन, देवता तरसेंगे,
तेरे पुनीत पद-वन्दन को।
हम भारतवासी याद रखेंगे,
तेरे करुणा-क्रन्दन को !!

पर पलड़ा अभी अधूरा था,
सौभाग्य-चिह्‌न को पाकर भी।
थी स्वर्ण-राशि में अभी कमी,
इतना बेहद ग़म खाकर भी॥

पर, वृद्धा एक तभी आई,
जर्जर तन में अकुलाती-सी।
अपनी छाती से लगा एक,
सुन्दर-चित्र छिपाती-सी॥

बोली, ''अपने इकलौते का,
मैं चित्र साथ में लाई हूं।
नेताजी, लो सर्वस्व मेरा,
मैं बहुत दूर से आई हूं॥ ''

वृद्धा ने दी तस्वीर पटक,
शीशा चरमर कर चूर हुआ !
वह स्वर्ण-चौखटा निकल आप,
उसमें से खुद ही दूर हुआ !!

वह क्रुद्ध सिंहनी-सी बोली,
''बेटे ने फांसी खाई थी !
उसने माता के दूध-कोख को,
कालिख नहीं लगाई थी !!

हां, इतना गम है, अगर कहीं,
यदि एक पुत्र भी पाती मैं !
तो उसको भी अपनी भारत-
माता की भेंट चढ़ाती मैं !!''

इन शब्दों के ही साथ-साथ,
चौखटा तुला पर आया था !
हो गई तुला समतल, कांटा,
झुक गया, नहीं टिक पाया था !!

बाबू सुभाष उठ खड़े हुए,
वृद्धा के चरणों को छूते !
बोले, ''मां, मैं कृतकृत्य हुआ,
तुझ-सी माताओं के बूते !!

है कौन आज जो कहता है,
दुश्मन बरबाद नहीं होगा !
है कौन आज जो कहता है,
भारत आज़ाद नहीं होगा !!''

 

('कदम-कदम बढ़ाए जा' से, सन्‌ 1993)

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