नेताजी का तुलादान

( वीर रस की कविताएं )   

भूमिका
नेताजी का तुलादान
खूनी हस्ताक्षर
हिन्दुस्तान हमारा है
मुक्ति-पर्व
प्रयाण-गीत
शहीदों में तू नाम लिखा ले रे !
 

 

कुछ तुलादान के लिए,
युवतियों ने आभूषण छोड़े थे।
जर्जर वृद्धाओं ने भेजे,
अपने सोने के तोड़े थे॥

छोटी-छोटी कन्याओं ने भी,
करणफूल दे डाले थे।
ताबीज गले से उतरे थे,
कानों से उतरे बाले थे॥

प्रति आभूषण के साथ-साथ,
एक नई कहानी आती थी।
रोमांच नया, उदगार नया,
पलड़े में भरती जाती थी॥

नस-नस में हिन्दुस्तानी की,
बलिदान आज बल खाता था।
सोना-चांदी, हीरा-पन्ना,
सब उसको तुच्छ दिखाता था॥

अब चीर गुलामी का कोहरा,
एक नई किरण जो आई थी।
उसने भारत की युग-युग से,
यह सोई जाति जगाई थी॥

लोगों ने अपना धन-सरबस,
पलड़े पर आज चढ़ाया था।
पर वजन अभी पूरा नहीं हुआ,
कांटा न बीच में आया था॥

तो पास खड़ी सुन्दरियों ने,
कानों के कुण्डल खोल दिए।
हाथों के कंगन खोल दिए,
जूड़ों के पिन अनमोल दिए॥

एक सुन्दर सुघड़ कलाई की,
खुल 'रिस्टवाच' भी आई थी।
पर नहीं तराजू की डण्डी,
कांटे को सम पर लाई थी॥

कोने में तभी सिसकियों की,
देखा आवाज़ सुनाई दी।
कप्तान लक्ष्मी लिए एक,
तरुणी को साथ दिखाई दी॥

उसका जूड़ा था खुला हुआ,
आंखें सूजी थीं लाल-लाल !
इसके पति को युद्ध-स्थल में,
कल निगल गया था कठिन काल !!

नेताजी ने टोपी उतार,
उस महिला का सम्मान किया।
जिसने अपने प्यारे पति को,
आज़ादी पर कुर्बान किया॥

महिला के कम्पित हाथों से,
पलड़े में शीशफूल आया !
सौभाग्य चिह्‌न के आते ही,
कांटा सहमा, कुछ थर्राया !

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