नेताजी का तुलादान

( वीर रस की कविताएं )   

भूमिका
नेताजी का तुलादान
खूनी हस्ताक्षर
हिन्दुस्तान हमारा है
मुक्ति-पर्व
प्रयाण-गीत
शहीदों में तू नाम लिखा ले रे !
 

 

उस दिन सुभाष सेनापति ने,
कौमी झण्डा फहराया था।
उस दिन परेड में सेना ने,
फौजी सैल्यूट बजाया था॥

उस दिन सारे सिंगापुर में,
स्वागत की नई तैयारी थी।
था तुलादान नेताजी का,
लोगों में चर्चा भारी थी ॥

उस रोज तिरंगे फूलों की,
एक तुला सामने आई थी॥
उस रोज तुला ने सचमुच ही,
एक ऐसी शक्ति उठाई थी-

जो अतुल, नहीं तुल सकती थी,
दुनिया की किसी तराजू से !
जो ठोस, सिर्फ बस ठोस,
जिसे देखो चाहे जिस बाजू से !!

वह महाशक्ति सीमित होकर,
पलड़े में आन विराजी थी।
दूसरी ओर सोना-चांदी,
रत्नों की लगती बाजी थी॥

उस मन्त्रपूत मुद मंडप में,
सुमधुर शंख-ध्वनि छाई थी।
जब कुन्दन-सी काया सुभाष की,
पलड़े में मुस्काई थी॥

एक वृद्धा का धन सर्वप्रथम,
उस धर्म-तुला पर आया था।
सोने की ईटों में जिसने,
अपना सर्वस्व चढ़ाया था॥

गुजराती मां की पांच ईंट,
मानो पलड़े में आईं थीं।
या पंचयज्ञ से हो प्रसन्न,
कमला ही वहां समाई थीं !!

फिर क्या था, एक-एक करके,
आभूषण उतरे आते थे।
वे आत्मदान के साथ-साथ,
पलड़े पर चढ़ते जाते थे॥

मुंदरी आई, छल्ले आए,
जो पी की प्रेम-निशानी थे।
कंगन आए, बाजू आए,
जो रस की स्वयं कहानी थे॥

आ गया हार, ले जीत स्वयं,
माला ने बन्धन छोड़ा था।
ललनाओं ने परवशता की,
जंजीरों को धर तोड़ा था॥

आ गईं मूर्तियां मन्दिर की,
कुछ फूलदान, टिक्के आए।
तलवारों की मूठें आईं,
कुछ सोने के सिक्के आए॥

 

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