क्या सोचा, क्या हुआ

( लोकप्रिय व्यंग्य-कविताएं )  

भूमिका
बोए गुलाब
अब मूर्ख बनो !
सांप ही तो हो.........
सत्ता
क्या सोचा, क्या हुआ
कवि हूं प्रयोगशील
भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
लालाजी के कुत्ते ?
चला जा !
सुकुमार गधे
व्यंग्य कोई कांटा नहीं
ईश्वर के घर लूट हुई
फर्क़ आदमी और जानवर में
कांटों ने हमें खुशबू दी है
सरकार कहते हैं
विडम्बना
सीखा पशुओं से



 

मैं हिन्दी का अदना कवि हूं,
कलम घिसी है, गीत रचे हैं।
व्यंग्य और उपहास किए हैं,
बहुत छपे हैं, बहुत बचे हैं।
मैंने भी सपने देखे थे,
स्वतंत्रता से स्वर्ग मिलेगा।
मुरझाए जन-मन-मानस में,
प्रसन्नता का कलम खिलेगा।

इसीलिए ही लाठी खाईं,
घर-जमीन भी फिसल गई थीं।
गोरों की गोलियां बगल से,
सन-सन करती निकल गई थीं।
पत्नी की परवाह नहीं की,
बच्चे भी अनाथ डोले थे।
पर स्वतंत्रता के आते ही,
नेताओं की जय बोले थे।

लाखों जन ऐसे भी निकले,
जोकि सुबह थे, शाम होगए।
जिनके घर नीलाम होगए,
सर भी कत्ले-आम होगए।
और हजारों ऐसे भी थे,
जो अपनापन भूल गए थे।
हंसते-हंसते कोड़े खाए,
फिर फांसी पर झूल गए थे।



 

जो जंगल-जंगल भटके थे,
छिपे-छिपे सब-कुछ करते थे।
आजादी की आग लगी थी,
और मारकर ही मरते थे।
कुछ उनमें फाकानशीन थे,
जिंदा रहने की मशीन थे,
झंडे पर कुर्बान होगए,
भारत मां की शान होगए।

जिनके लिए जेल मंदिर था,
सदा पैर उसके अंदर था।
पराधीनता ही डायन थी,
हर गोरा उनको बंदर था।
जो सिर का सौदा करते थे,
नाम सुना दुश्मन डरते थे।
कुछ होली, कुछ ईद होगए,
लाखों वीर शहीद होगए।

मेरी तरह सभी ने यारो,
रात-रात सपने बोए थे।
भारत मां की दीन-दशा पर,
ज़ार-ज़ार हम सब रोए थे।
सिर्फ इसलिए- अपना भारत
फिर से शोषणहीन हो सके।
मिटे विषमता, सरसे समता,
जन-गण स्वस्थ, अदीन हो सके।


 

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