सांप ही तो हो.........

( लोकप्रिय व्यंग्य-कविताएं )  

भूमिका
बोए गुलाब
अब मूर्ख बनो !
सांप ही तो हो.........
सत्ता
क्या सोचा, क्या हुआ
कवि हूं प्रयोगशील
भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
लालाजी के कुत्ते ?
चला जा !
सुकुमार गधे
व्यंग्य कोई कांटा नहीं
ईश्वर के घर लूट हुई
फर्क़ आदमी और जानवर में
कांटों ने हमें खुशबू दी है
सरकार कहते हैं
विडम्बना
सीखा पशुओं से


 

 


सांप,
दो - दो जीभें होने पर भी
भाषण नहीं देते ?
आदमी न होकर भी
पेट के बल चलते हो
यार !
हम तुम्हारे फूत्कार से नहीं डरते
सांप ही तो हो,
भारत के रहनुमा तो नहीं हो !

 

('हास्य सागर' से, सन्‌ 1996)



 

 

 

 

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