सरकार कहते हैं

( लोकप्रिय व्यंग्य-कविताएं )  

भूमिका
बोए गुलाब
अब मूर्ख बनो !
सांप ही तो हो.........
सत्ता
क्या सोचा, क्या हुआ
कवि हूं प्रयोगशील
भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
लालाजी के कुत्ते ?
चला जा !
सुकुमार गधे
व्यंग्य कोई कांटा नहीं
ईश्वर के घर लूट हुई
फर्क़ आदमी और जानवर में
कांटों ने हमें खुशबू दी है
सरकार कहते हैं
विडम्बना
सीखा पशुओं से


 

 

बुढ़ापे में जो हो जाए उसे हम प्यार कहते हैं,
जवानी की मुहब्बत को फ़कत व्यापार कहते हैं।
जो सस्ती है, मिले हर ओर, उसका नाम महंगाई,
न महंगाई मिटा पाए, उसे सरकार कहते हैं।

जो पहुंचे बाद चिट्ठी के उसे हम तार कहते हैं,
जो मारे डॉक्टर को हम उसे बीमार कहते हैं।
जो धक्का खाके चलती है उसे हम कार मानेंगे,
न धक्के से भी जो चलती उसे सरकार कहते हैं।

कमर में जो लटकती है, उसे सलवार कहते हैं,
जो आपस में खटकती है, उसे तलवार कहते हैं।
उजाले में मटकती है, उसे हम तारिका कहते,
अंधेरे में भटकती जो, उसे सरकार कहते हैं।

मिले जो रोज बीवी से, उसे फटकार कहते हैं,
जिसे जोरू नहीं डांटे, उसे धिक्कार कहते हैं।
मगर फटकार से, धिक्कार से भी जो नहीं समझे,
उसे मक्कार कहते हैं, उसे सरकार कहते हैं।

सुबह उठते ही बिस्तर से 'कहां अखबार' कहते हैं,
शकल पर तीन बजते 'चाय की दरकार' कहते हैं।
वे कहती हैं, 'चलो बाजार' हंसकर शाम के टाइम,
तो हम नज़रें झुकाकर 'मर गए सरकार' कहते हैं।


( 'रंग-जंग और व्यंग्य' से, सन्‌ 1966 )

 

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