कांटों ने हमें खुशबू दी है

( लोकप्रिय व्यंग्य-कविताएं )  

भूमिका
बोए गुलाब
अब मूर्ख बनो !
सांप ही तो हो.........
सत्ता
क्या सोचा, क्या हुआ
कवि हूं प्रयोगशील
भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
लालाजी के कुत्ते ?
चला जा !
सुकुमार गधे
व्यंग्य कोई कांटा नहीं
ईश्वर के घर लूट हुई
फर्क़ आदमी और जानवर में
कांटों ने हमें खुशबू दी है
सरकार कहते हैं
विडम्बना
सीखा पशुओं से

 


 

कांटों ने हमें खुशबू दी है,
फूलों ने हमेशा काटा है।
बांहों ने पिन्हाई जंजीरें,
आहों ने दिया सन्नाटा है।
अपनों ने अड़ंगी मारी है,
गैरों से सहारा पाया है।
अनजान से राहत मिल भी गई,
पहचान से धोखा खाया है।
कुर्सी ने हमेशा ठोकर दी,
थैली ने सदा संदेह किए।
घड़ियालों से रिश्तेदारी कर
मछली की तरह तड़पे हैं, प्रिये !

खुशियों को खरीदा है हमने,
सेहत को सदा नीलाम किया।
लमहा वह याद नहीं आता,
जिस वक्त कि हो आराम किया।
रोगों को सहेजा है हमने,
भोगों को नहीं परहेज़ा है।
गम बांटे नहीं, खुशियां बोईं,
मुस्कान को सब तक भेजा है।
हम हिन्द की ख़ातिर मर न सके,
हिन्दी का भी दामन भर न सके।
इन्सान तो बनना दूर रहा,
शैतान से तौबा कर न सके।


('हास्य सागर' से, सन्‌ 1996)

 

 




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