फर्क़ आदमी और जानवर में

( लोकप्रिय व्यंग्य-कविताएं )  

भूमिका
बोए गुलाब
अब मूर्ख बनो !
सांप ही तो हो.........
सत्ता
क्या सोचा, क्या हुआ
कवि हूं प्रयोगशील
भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
लालाजी के कुत्ते ?
चला जा !
सुकुमार गधे
व्यंग्य कोई कांटा नहीं
ईश्वर के घर लूट हुई
फर्क़ आदमी और जानवर में
कांटों ने हमें खुशबू दी है
सरकार कहते हैं
विडम्बना
सीखा पशुओं से


 

आदमी और रीछ में क्या अंतर है ?
आदमी की हज़ामत बनती है, रीछ की नहीं।
आदमी और हाथी में क्या अंतर है ?
हाथी पर अंकुश लगता है, आदमी पर नहीं।
आदमी और घोड़े में क्या अंतर है ?
घोड़ा आदमी की तरह खाट पर पड़कर नहीं सो सकता।
आदमी और बंदर में क्या फर्क़ है ?
बंदर आदमी की तरह अंडरवीयर नहीं पहनता।
वह उससे भी ऊंची छलांगें लगाता है
मगर अपने को मुछंदर नहीं बताता है।
आदमी और नेता में क्या फर्क़ है ?
आदमी नेता हो सकता है
मगर नेता आदमी नहीं।


('हास्य सागर' से, सन्‌ 1996)

 

 




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