आराम करो !

( लोकप्रिय हास्य कविताएं )  

भूमिका
पत्नी को परमेश्वर मानो
आराम करो !
साली क्या है रसगुल्ला है
साला ही गरम मसाला है
सास नहीं, भारत माता हैं
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
नई क्रांति
चले आ रहे हैं
पलकों पर किसे बिठाऊं मैं ?
एजी कहूं कि ओजी कहूं ?
समधिन मेरी रसभीनी है
मामाजी !
जूते चले गए
नहाऊं मैं !
अनारी नर
धन्यवाद
भाभीजी नमस्ते


एक मित्र मिले, बोले - ''लाला
तुम किस चक्की का खाते हो ?
इस छह छटॉँक के राशन में भी
तोंद बढ़ाए जाते हो !

क्या रक्खा मांस बढ़ाने में
मनहूस अक्ल से काम करो !
संक्रान्ति काल की बेला है
मर मिटो जगत में नाम करो !''

हम बोले, रहने दो लिक्चर
पुरखों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा
आराम करो, आराम करो !

आराम, जिंदगी की कुंजी
इससे न तपेदिक होती है।
आराम-सुधा की एक बूँद
तन का दुबलापन खोती है।

आराम शब्द में राम छिपा
जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो
विरला ही योगी होता है।

इसलिए तुम्हें समझाता हूँ
मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन-यौवन क्षणभंगुर
आराम करो, आराम करो !

यदि करना ही कुछ पड़ जाए
तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे
बस, लंबी-लंबी बात करो !

 



 


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