भाभीजी नमस्ते

( लोकप्रिय हास्य कविताएं )  

भूमिका
पत्नी को परमेश्वर मानो
आराम करो !
साली क्या है रसगुल्ला है
साला ही गरम मसाला है
सास नहीं, भारत माता हैं
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
नई क्रांति
चले आ रहे हैं
पलकों पर किसे बिठाऊं मैं ?
एजी कहूं कि ओजी कहूं ?
समधिन मेरी रसभीनी है
मामाजी !
जूते चले गए
नहाऊं मैं !
अनारी नर
धन्यवाद
भाभीजी नमस्ते




'भाभीजी, नमस्ते !'
'आओ लाला, बैठो !' बोलीं भाभी हंसते-हंसते।
'भाभी, भय्या कहां गए हैं ?' 'टेढ़े-मेढ़े रस्ते !'
'तभी तुम्हारे मुरझाए हैं भाभीजी, गुलदस्ते !'
'अक्सर संध्या को पुरुषों के सिर पर सींग उकसते !'
'रस्सी तुड़ा भाग ही जाते, हारी कसते-कसते !'
'लेकिन सधे कबूतर भाभी, नहीं कहीं भी फंसते !
अपनी छतरी पर ही जमते, ज्यों अक्षर पर मस्ते !'
'भाभीजी, नमस्ते !'

चला सिलसिला रस का !
'बैठो, अभी बना लाती हूं लाला, शर्बत खस का।'
'भाभी, शर्बत नहीं चाहिए, है बातों का चसका।'
'लेकिन तुमसे मगज मारना देवर, किसके बस का ?'
भाभी का यह वाक्य हमारे दिल में सिल-सा कसका।
तभी लगाया भाभीजी ने हौले से यूं मसका-
'ओहो, शर्बत नहीं चलेगा ? वाह, तुम्हारा ठसका !'
'कलुआ रे, रसगुल्ले ले आ ! ये ले पत्ता दस का !'
चला सिलसिला रस का।

भाभी जी का लटका !
कलुआ लेकर नोट न जाने कौन गली में भटका ?
बार-बार अब हम लेते थे दरवाजे पर खटका।
बतरस-लोभी चित्त हमारा, रसगुल्लों में अटका।
कुरता छू भाभी जी बोली, 'खूब सिलाया मटका।'
'लेकिन हम तो देख रहे हैं ब्लाउज नरगिस-कट का।'
आंखों-आंखों भाभीजी ने हमको हसंकर हटका।
'ये नरगिस का चक्कर लाला, होता है सकंट का।'
भाभी जी का लटका !


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