तो, सुनो मेरी कहानी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
नहीं बना। ब्रज के महान संगीतज्ञ ग्वारिया बाबा मुझे संगीत, नृत्य और नाटक में पारंगत देखना चाहते थे। उनकी साध पूरी नहीं हुई। भारत प्रसिद्ध चंद्रसेन उर्फ 'भौंरा' पहलवान ने मुझे अपना उत्तराधिकारी बनाने की ठानी थी, पर किसी से कुश्ती न हारने वाले मुझसे हार गए। भारत प्रसिद्ध शतरंज मार्तण्ड कृष्णकवि ने मुझे बड़ी चालें सिखाईं, वे भी मात खा गए। चक्रधारी नागा बाबा हरिदास मुझे तलवार, बनैटी, धनुर्विद्या और लाठी भांजने में अपने अखाड़े का खलीफा बनाने चले थे। बेचारे खुद अखाड़ा छोड़ गए। बाबू गुलाबराय, डॉ0 सत्येन्द्र, प्रकाशचंद्र गुप्ता, नंददुलारे वाजपेयी और शांतिप्रिय द्विवेदी सोचते थे कि यह व्यक्ति हिन्दी-समीक्षा-साहित्य में कुछ करके दिखाएगा, उनकी आशाओं पर भी तुषारापात हो गया। डॉ0 वासुदेवशरण अग्रवाल, सेठ कन्हैयालाल पोद्दार और 'रसालजी' सोचते थे कि मैं ब्रजभाषा और ब्रज साहित्य के लिए निश्चय ही कुछ कर पाऊंगा, वह भी संभव नहीं हुआ। बन गया मैं लुढ़कते-लुढ़कते, उठते-गिरते, घिस-पिटकर मन से कवि, ललक से लेखक और कर्म से पत्रकार।
कभी सोचा भी नहीं था कि मैं अपनी आपबीती लिखूंगा। वह तो भाई धर्मवीर भारती ने शुरू करा दी- 7 जून, 1981 से मेरे सात लेख लगातार 'धर्मयुग' में छापे। उनके बाद श्री गणेश मंत्री आए तो उन्होंने भी 'धर्मयुग' के लिए पांच लेख मांग लिए। इन्हें देखकर कुछ अन्य पत्र-पत्रिकाओं ने भी मुझसे संस्मरण चाहे। इस तरह पूरे बारह वर्षों में एक-एक करके, समय निकाल-निकालकर मैंने इस आपबीती को 'कहो व्यास, कैसी कटी ?' के रूप में पूरा किया है। क्योंकि ये निबंध अलग-अलग लिखे गए है, इसलिए घटनाओं और व्यक्तियों की चर्चा और पुनरावृत्ति आपको देखने को मिलेगी। जब इसे पुस्तकाकार करने का विचार मन में आया तब तक स्मृति तो जाग्रत थी, लेकिन सन्‌-संवत्‌ और व्यक्तियों के नाम कभी-कभी तो बहुत सोचने पर भी याद नहीं आए। यह बात आपको खटक सकती है।
एक बात और-यह पुस्तक बोलकर लिखवाई गई है। इसलिए बोलचाल की भाषा का मज़ा इसमें है। जब जो शब्द मन में आया वही लिखवाया। वह चाहे ब्रज का हो, हिन्दी का हो, उर्दू का हो या अंग्रेजी का । वैसे भी मैं यह मानता हूं कि हिन्दी भाषा को बहुभाषाओं में प्रचलित शब्दों से संपन्न होना ज़रूरी है।
एक बात और बता दूं कि इन बारह वर्षों में मेरे बोले को लिखनेवाले बार-बार बदले हैं। मेरे लिखियाजनों की श्रेणी में कुमारी भी रही हैं और श्रीमती भी। कुछ ने कहने पर लिखा है और कुछ ने कर्तव्य मानकर रस लेकर लिखा है। महत्त्व व्यास का ही नहीं, सरस्वती और गणेश का भी है। मेरा एक स्वभाव यह भी है कि मेरा लिखिया प्रबुद्ध और आत्मीय होना चाहिए। यह प्रबुद्धता और आत्मीयता मुझे इस पुस्तक को अंतिम रूप देने वाले श्री देवराजेन्द्र से मिली है। गलतियां आप उनके खाते में डालिए और गुन-औगुन मेरे मत्थे मढ़िए। बहुत होगया, अब पुस्तक पढ़िए !

('कहो व्यास, कैसी कटी ?', सन्‌ 1994)

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