तो, सुनो मेरी कहानी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
टाइम्स ऑफ इंडिया के श्यामलाल एवं कार्टूनिस्ट शंकर, अहमद, संतानम कृपानिधि, कल्हण और श्यामाचरण काला आदि से मेरी भेंट कामचलाऊ रही है। मेरे अंग्रेजी अज्ञान को दूर करने के लिए संपादक शिरोमणि पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने एक नुस्खा तज़वीज़ किया था कि मैं किसी एंग्लो-इंडियन लड़की से दोस्ती कर लूं, तो मेरी अंग्रेजी फर्राटेदार बन जाएगी, लेकिन इसका भी डौल नहीं बैठा।
मैं क्या हूं, इसे आप पहले अच्छी तरह जान लें। साहित्यकार मुझे पत्रकार समझते हैं और वे पत्रकारिता को साहित्य नहीं मानते। पत्रकार मुझे साहित्यकार मानते हैं। उनका मत है कि साहित्यिक भाषा, कला-कल्पना की उड़ान और ख्याली दुनिया का आदमी, पत्रकारिता के लिए 'मिसफिट' है। इतना ही नहीं, कांग्रेसी मुझे भूतपूर्व जनसंघी समझते हैं। जनसंघियों का कहना है कि हम धोखा नहीं खा सकते, यह ऊपर से नीचे तक कांग्रेसी है। समाजवादी कहते हैं कि मैं 'टंडनाइट' हूं और 'टंडनाइट' कहते हैं कि भाषा के मसले पर यह 'लोहियावादी' है। साम्यवादी समझते हैं कि मैं पूंजीपतियों का एजेंट हूं और पूंजीपतियों ने यह खबर खोज निकाली है कि मैं मुंशी प्रेमचंद के ज़माने से ही प्रगतिशील लेखक संघ से कभी सीधा और कभी तिरछा संबद्ध रहा हूं। आज के लेखक मुझे पुराणपंथी या रीतिकालीन कहते हैं और पुराने लेखक यह मानते हैं कि मैं सींग कटाकर नये बछड़ों में शामिल होने का प्रयत्न करता रहा हूं। बात यहीं तक होती तो गनीमत थी। ब्रजवासी कहते हैं कि मैं ब्रज का हूं। राजस्थानी मानते हैं कि गौड़ ब्राह्मण और व्यास तो राजस्थान से गए हैं। आगरा, इटावा, इलाहाबाद और बनारस जहां-जहां मैं थोड़े-बहुत दिन रहा हूं, वे मुझे दिल्लीवासी मानने के लिए तैयार ही नहीं। दिल्ली के दिलवाले लोग तो अब मुझे दिल्लीवाला ही कहने लगे हैं। यानि एड़ी से लेकर चोटी तक मैं विवादग्रस्त आदमी हूं। यदि विवादग्रस्तता अपने-आप में कोई गुण है, यदि नहीं है तो वह मान ली जानी चाहिए, तो निस्संदेह मैं गुणी आदमी हूं। क्योंकि यदि मैं गुणी नहीं होता तो अपने लेखन और करतबों से लाखों-लाख नर-नारियों को कैसे मूर्ख बना सकता था ? कोई-न-कोई करामात मुझमें है अवश्य। इसी करामात को एक कथा के रूप में प्रस्तुत करने जा रहा हूं।
लेकिन ठहरिए, एक बात और सुन लीजिए। पिताजी मुझे संस्कृत का पंडित और मर्यादी वैष्णव बनाना चाहते थे।

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