आपुन मुख हम आपुन करनी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
और कविता ! वह तो जी का जंजाल है। कविता जिसके जीवन में आई तो समझो कि वह आदमी नहीं रहा, कुछ और होगया है। रात-रात भर तारे गिनकर तुकों और काफियों, प्रारंभ और क्लाइमेक्स के बारे में सोचता रहता है। रात अंधेरी हो तो उसकी कविता में अधंकार आ जाता है। चांद-तारों को देखकर उसके मन में तरह-तरह की तस्वीरें उभरती रहती हैं। दिन में वह पढ़ता नहीं, लिखता नहीं, कोई और काम करता नहीं। या तो किसी अनदेखी प्रेयसी के संबंध में सोचता रहता है या प्रतीकों और बिम्बों अथवा इनके मानवीकरण के संबंध में सोचता रहता है। बड़ी मुश्किल से कविता बन पाती है। पत्रों में छप जाए तो पुस्तकाकार नहीं हो पाती। पुस्तकाकार हो जाए तो बिक नहीं पाती। बिकती नहीं तो अर्थ से भी गए और यश से भी। या तो आपस में तू मेरी पढ़ और मैं तेरी पढ़ता हूं, की रीति पर चलो या मंचीय कवियों को कोसो। मंचीय कविता तो कविता रह ही नहीं गई। लिख मारी शताधिक कविताएं। सोचा, बड़ा तीर मार लिया। लेकिन धीरे-धीरे वे विस्मृति के गर्त में मेरे सामने ही विलीन होती जा रही हैं। लोग कहते हें कि अब नया लिखो। पागल हैं- "आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे ?"
इसीलिए हमने अपनी आत्मकथा लिखी है। फिर आत्मप्रशंसा करता हूं कि इसमें पग-पग पर कविता है। एक-एक लेख अपने आपमें ललित निबंध है। हर लेख मेरी एक कहानी है। पूरी पुस्तक पठनीय है, समूचा उपन्यास है। भला-बुरा जैसा भी हूं, अपनी पूर्ण क्षमता से इस पुस्तक में हूं।
महर्षि चाणक्य ने कहा है कि जो अपने मुंह से अपनी प्रशंसा करता है, वह प्रशंसनीय नहीं है। प्रशंसा का पात्र तो वह है जिसकी तारीफ दूसरे लोग करें। चाणक्य यदि आज होते तो मैं उनसे कहता कि गुरुवर, प्रशंसा करने वालों का युग समाप्त हो गया। आजकल निंदा-युग चल रहा है। अब प्रशंसा की नहीं जाती, कराई जाती है। मैंने जीवनभर यह शुभकार्य किया है। आपको तो चंद्रगुप्त मिल गया, लेकिन मेरी प्रशंसा कराने की कला को सीखने और समझने वाला अभी तक कोई नहीं आया। किसी को आज किसी की प्रशंसा करने की फुरसत है ही कहां ? कोई हो तो उसे भेजो। नहीं तो यह पुस्तक भी मैंने लोगों से अपनी प्रशंसा कराने के लिए ही लिखी है। यह मेरी कला का प्रशंसनीय उदाहरण है। जो इसे पढ़कर प्रशंसा करने को बाध्य न होंगे तो मैं यहीं कहूंगा- "गुन न हिरानौ, गुन-गाहक हिरानौ है।"

('कहो व्यास, कैसी कटी ?', सन्‌ 1994)

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