आपुन मुख हम आपुन करनी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
किस पात्र को किस पात्र से कैसी भाषा बुलवानी है। उसकी कैसी सुगति या दुर्गति करनी है ? कब पर्दा उठना है, कब गिरना है ? किस समस्या को उभारना है ? लिखो तो उससे पहले यह सोच लो कि दर्शकों का उससे मनोरंजन भी होना चाहिए ? हीरो कैसा हो, विलेन कैसा हो, नायिका कैसी हो और प्रतिनायिका कैसी हो, उनकी वेशभूषा क्या हो और जब वे मंच पर उपस्थित होते हों तो उस कक्ष का या उस राह का वातावरण कैसा हो ? कितने झंझट हैं नाटक-लेखन में ? फिर नाटक लिखना ही पर्याप्त नहीं। उसका मंचन होना भी आवश्यक है। किसी नामधारी प्रकाशन से उसका छपना तो बहुत ही जरूरी है। नाटक छपा और पुरस्कृत न हुआ तो परिश्रम बेकार। करो जोड़-तोड़। मिलाओ कुलाबे। बनाओ अपनी खाल को मोटी जो पेशेवर नाट्य-समीक्षकों की नुक्स निकालने वाले तीखे तीरों की बौछार को सह सके। इसीलिए हमने नाटक नहीं लिखे। नाटकीय बनाया अपने जीवन को ही नहीं, अपने लेखन को भी।
कथा-लेखन तो और भी दुष्कर कार्य है। पूर्ववर्ती और समकालीन कथा-लेखकों से अलग हटकर कुछ सोचो। परंपराओं को तोड़ने का साहस संजोओ। कथानक का ताना-बाना बुनो। समाज के अनमोल या बेमोल पात्रों का चुनाव करो। लिखने से पहले यह तय करो कि कहानी या उपन्यास कितने पृष्ठों के होंगे। उससे पहले तय करो कि उसकी प्रासंगिकता को, उसकी आंचलिकता को। बचो प्रेममचंद से। बचो वृंदावनलाल वर्मा से। बचो रेणु से। बचो अमृतलाल नागर से। भूलो जैनेन्द्र और अज्ञेय को। देखना कहीं तुम्हारे कथा-लेखन पर निर्मल वर्मा, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव या कमलेश्वर की छाया न पड़े। खबरदार यदि 'गुनाहों का देवता' पढ़ने का गुनाह किया ! याद रखो कि तुम्हारी तुलना देश के कथा-लेखकों से ही नहीं, पाश्चात्य कथा-लेखकों से भी की जाएगी। टालस्टाय तो अप्रासंगिक हो गए, लेकिन गोर्की की 'मां' अभी जिंदा है। मोपासां, समरसेट माम और कामू जैसे अनेक लेखक तुम्हारे लेखन के लिए खतरे बने हुए हैं। न बाबा, हमने ऐसी जोखिम नहीं उठाई। दूसरों की कहानी क्या लिखना ? लिखनी हो तो अपनी लिखो। झूठ के साथ थोड़ा सच मिलाओ। सपाट इतिवृत्त में साहित्य का रस घोलो। अपने जीवन के लालित्य को आप बीती में घोलकर कहो कि यह आपबीती ललित साहित्य की विधा में लिखी गई है। क्यों, ठीक है न ?

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