आपुन मुख हम आपुन करनी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
यह पुस्तक भी मैंने प्रशंसा पाने के लिए लिखी है। अब उतरती उम्र में और कर भी क्या सकता हूं ? चाहता हूं कि लोग आएं, कहें और लिखें मेरे संबंध में अपने प्रशंसनीय उदगार। परंतु विडंबना देखिए कि मेरे जीते-जी लोगों ने मेरी प्रशंसा करना बंद कर दिया है। मेरे रहते ही मुझे भूले जा रहे हैं। तब मैं कालजयी कैसे बनूंगा ? मैंने तो समझा था कि मैं अमरता का वरदान लेकर अवतरित हुआ हूं। लेकिन ये क्या हो रहा है ? उठाओ कलम ! बताओ दुनिया को कि मैं क्या हूं ? भाई, मेरे रहते ही मुझको समझ लो न ! बाद में पछताओगे और लोगों से पूछते फिरोगे। जो गलती सूरदास, तुलसी, कबीर या दूसरे साहित्यकारों ने की है वह मैं नहीं करूंगा कि ये लोग अपने बारे में किसी को कुछ नहीं बता गए। इसलिए अब लोगों को माथापच्ची करनी पड़ रही है। ढूंढ़-ढूंढकर संबद्ध और असंबद्ध बातों के पोथे लिखे जा रहे हैं और उन पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। मैं इस संबंध में शुरू से ही सावधान रहा हूं। कोई माने या न माने, मैंने अपनी पुस्तकों पर अपने नाम से पहले प्रकाशकों को हास्य-रसावतार लिखने दिया है। लोगों को टंडनजी का उत्तराधिकारी कहने दिया है। किसी ने मुझको ब्रज का भीष्मपितामह कहा तो मैंने सुझाया कि हो जाए इस पर एक उत्सव। मेरे जन्मस्थान को देखने के लिए लोग तीर्थयात्रा पर निकलें और उनको कुछ पता नहीं चले, मैंने इसलिए मित्रों से कहा कि बनाओ व्यास-जन्मस्थान। पधराओ ऊंचे शिखर के नीचे सरस्वती की प्रतिमा। कागज तो बहुत काले कर लिए, अब श्वेत पत्थरों को काला करो और जड़ दो इनमें मेरा जीवनवृत्त। मकान बनाओ पीछे, पहले लिख दो-- 'व्यास-निवास'। मैं बहुत शीघ्र महाकवि और महाप्राण बनने वाला हूं। संभालकर रखो मेरी जूतियां से लेकर टोपियां तक। चित्रों से लेकर पनडब्बे और पीकदान तक। देखो, ये अलभ्य वस्तुएं विदेश न चली जाएं। भारतीय संस्कृति और साहित्य की धरोहर देश में ही रहनी चाहिए।
हां, तो मैं कह रहा था कि आत्मकथा-लेखन बहुत सरल कार्य है। नाटक लिखो तो पहले रंग-सज्जा और मंच-निर्देशों के बारे में सोचो।

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