राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
अपने बच्चों को कॉन्वेंटों में पढ़ाते हैं और मांग करते हैं ऐसे अंग्रेजी स्कूलों को बंद करने की। हिन्दी-प्रदेश के निवासी भी जब अपने नामपट्ट अंग्रेजी से हिन्दी में नहीं बदलवाते हैं, अपने उत्सवों और संस्कारों के पत्र अभी तक अंग्रेजी में छपवाते हैं, हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं को छोड़कर अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हैं और मुंह से हिन्दी की बात करते हुए अंग्रेजी के मुकाबिले हिन्दी को हीन मानते हैं तो हिन्दी का प्रचार कैसे होगा ? हम केंद्रीय सरकार से तो हिन्दी के व्यवहार को बढ़ाने की अपील करते हैं, लेकिन हिन्दी-प्रदेशों की सरकारों में, वहां के न्यायालयों में, शिक्षण-संस्थाओं में, व्यापार और व्यवहार में धड़ल्ले से जो अंग्रेजी चल रही है, उसके लिए कुछ नहीं करते। हम प्रदेश सरकारों की हिन्दी संबंधी घोषणाओं से संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन हिन्दी की संस्थाएं या हिन्दी के नेता तथा कार्यकर्ता कभी ऐसा कष्ट नहीं करते कि वे सरकारों के अंग्रेजी-कार्य पर निगरानी रखें और जहां-जहां वह अनुचित रूप से थोपी जा रही है, उसका वैध तरीके से जनमत बनाकर प्रतिकार करें।
अब हिन्दी के संबंध में कहने, लिखने और तर्क देने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा कौन सा तर्क है जो हिन्दी के संबंध में देने से बच गया हो ? हिन्दी के संबंध में गांधीजी ने जितना कहा है उतना कोई क्या कहेगा ? जब भाषा के संबंध में गांधीजी की बात नहीं सुनी जाती, तब हमारी-आपकी कौन सुनेगा। इसलिए कहो मत, करो ! गांधीजी ने कहा ही नहीं, किया भी। उन्होंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो बार सभापति रहकर हिन्दी को बल प्रदान किया। 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा' का निर्माण करके दक्षिण के चारों प्रदेशों में घर-घर हिन्दी की ज्योति जगाई। शेष हिन्दीतर राज्यों में हिन्दी के प्रचार के लिए उन्होंने वर्धा में 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' का गठन किया। वह हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए उसका नाम हिन्दुस्तानी तक करने के लिए तैयार होगए, लेकिन अपने को हिन्दीजन कहने वाले लोगों ने न तब कुछ किया और न आज हिन्दी के लिए कुछ कर रहे हैं। उन्होंने हिन्दी-संस्थाओं पर कब्जा करने और उनके कार्यों में रुकावट डालने का ही सतत्‌ प्रयत्न किया है। कथनी और करनी से उन्होंने हिन्दीतर भाइयों को हिन्दी के प्रति उदासीन होने में ही अपनी विशिष्ट भूमिका निभाई है।

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